आ गए अच्छे दिन

मोदी सरकार को यह साबित करने में भले ही अभी देर लगे कि वास्तव में अच्छे दिन आ गए हैं पर इस जनादेश का निरपेक्ष विश्लेषण बड़ी साफगोई से यह साबित करता है कि अच्छे दिन आ रहे हैं...

मतगणना के ठीक बाद नरेंद्र मोदी ने एक सभा में लोगों की तरफ नारा उछाला, अच्छे दिन....... अच्छे दिन ..... जवाब में जन समूह का घोष था, आ गए..... आ गए.... . अब कुछ नकारात्मक सोच वाले लोग और कट्टर भाजपा विरोधी भले इसे कोरा नारा और सियासी भुलावा अथवा मजाक समझें पर संसार भर में खुशफहमी के मामले में काफी ऊंचा स्थान हासिल करने वाला यह उत्सवधर्मी देश इतना नकारात्मक कभी नहीं रहा, सकारात्मकता और आशावादिता इसकी संस्कृति और यहां के लोगों के खून में है, सो महज भाजपाईयों को ही नहीं अधिसंख्य जनता को भी यही लगता है कि अच्छे दिन आ चले हैं. अच्छे दिन आ गए हैं यह बात मोदी का काम काज जब साबित करेगा तब करेगा, उनकी सरकार यह यह साबित कर पाए या नहीं कि वास्तव में अच्छे दिन आ गए हैं पर जनता ने अपने जनादेश के जरिए जरूर साबित कर दिया है कि मोदी समेत देश के अच्छे दिन आ गए हैं. सरकार बनने और उसके हनीमून पीरियड के गुजरने, कामकाज शुरू करने फिर उसके काम काज के फलित सामने आने में अभी बहुत देर है, मगर जनादेश तो ठीक सामने हैं और इसका निरपेक्ष विश्लेषण किया जाए तो इसके साफ संकेत हैं, अच्छे दिन आ गए हैं.
जनदेश का पहला संकेत- अच्छे दिन लाने के लिए देश को चाहिए एक सशक्त, मुखर और सक्रिय नेतृत्व. इंदिर गांधी के बाद देश आंशिक तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी को छोड कर राष्ट्रीय पटल पर नेतृत्व का अभाव देश लगातार महसूस करता रहा है. मोदी के रूप में देश को लीडर दिखा और जनत ने उसे चुन लिया. मोदी की बुराई करने वाले उन्हें लाख बुरा कहते रहें पर जहां तक एक दमदार लीडर की छवि है उस मुकाबले में देश के अधिकांश नेता शून्य हैं या कुछ नेता गणॅ भले थोड़े जनप्रिय हों अथवा बेहतर रणनीतिकार, सफल राजनेता हों या शराफत और ईमानदारी के कथित पुतले पर कुल मिला कर नायक की जो छवि मोदी की है वे उसके आसपास तक नहीं पहुंचते. सो जनादेश ने साफ कर दिया है कि जनता अंधेरे में नहीं रहने वाली कि पार्टी अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी आज्ञाकारी को प्रधानमंत्री बना दे भले ही उसमें नेतृत्व क्षमता हो या न हो. फैसला पार्टी लेती है पर नीतियों को लागू करने का काम तो प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल का होता है. प्रधानमंत्री सरकार की सारी बातों के लिए जिम्मेदार एक चेहरा होता है और जनता को पता रहना चाहिए कि वह चेहरा या व्यक्ति कौन है जो इस जनादेश के प्रति जवाबदेह होगा क्योंकि सामूहिक जिम्मेदारी का मतलब कोई जिम्मेदार नहीं. सो वास्तविक जनप्रिय नेता, जमीनी नेतृत्व को तरजीह देने वाले राजनीति के अच्छे दिन आने वाले हैं.

इस जनादेश ने देश में उम्मीदों के बीज बोए हैं. अब अगर ये बीज ठीक से नहीं जनमे, पनपे, सुफल न दे सके तो जनता इससे भी जबर्दस्त पाटा चला कर फिर नए किस्म के बीज बोने की कला जान गई है


तो अब इस मुगालते से भी मुक्ति पा लेनी चाहिए कि यह जीत किसी पार्टी की है. भजपाई नेता भले ही सामने इतरा लें पर परोक्ष तौर पर जानते हैं कि यह जीत मोदी की है. भाजपा को पता है कि पूर्व अध्यक्ष गडकरी, वर्तमानअध्यक्ष राजनाथ सिंह, चुनाव हारने वाले अरुण जेतली, जीतने वाली सुषमा स्वराज यहां तक कि अपने मार्ग दर्शक आडवाणी तक को आगे करके चुनाव लड़ते तो भले ही कॉंग्रेस हार जाती पर इस तरह की सफलता कतई नहीं मिलती. पार्टी के साथ ही राजनैतिक विचारधारा को भी जनता ने रास्ता दिखा दिया है. मोदी की जीत को एकबारगी हिंदुत्ववादी या दक्षिणपंथी अपनी जीत समझ लें पर यह उनकी शतप्रतिशत खुशफहमी ही होगी. वामपंथ हाशिए से भी दूर सिमटता जा रहा है तो समूचे देश में पहुंच रखने वाले मध्यम मार्गी बुरी तरह धूल चाटते, सिमटते जा रहे हैं. गैर कंग्रेस, गैर भाजपा, वाम और समाजवाद भी नहीं का अलग तरह की भ्रष्टाचार विरोधी जनोन्मुख राजनीति की विचारधारा का उदय हुआ पर फिलहाल जनता का रुख धारा में दिखता है, विचार में नहीं. इतना ही नहीं सो यह जनादेश अपनी राजनीतिक विचारधारा के जंजाल में फांसने वालों को सतर्क होने की बात कहता है, शायद दक्षिणपंथी यह बात एक दो दशक बाद समझेंगे. तो, जाहिर है अछे दिन आने वाले हैं क्यों कि इसके साथ सातह ही जनादेश के ट्रेंड से लगता है कि गढबंधन की मजबूरियां गिना , दोष दूसरों पर थोप कर जिम्मेदारियों से बच निकलने के राजनीतिक धूर्तता के दिन भी गए.
यह जनादेश धर्म, जाति, क्षेत्र और गांव शहर के दायरों से आंशिक तौर पर ही सही पर इससे उठने के संकेत देता है. यह संकेत आगे चल कर और बड़ा होगा क्यों कि इस बार के युवा मतदाता अगली बार और बढेंगे, तादाद, उम्र, अनुभव हर तरीके से. यह अंतिम मौका था यह समझने के लिए कि यदि नेतृत्व को ले कर असमंजस की स्थिति न रहे तो सारे मुस्लिम वोट एक जुट हो कर भी कोई बड़ा प्रभाव नहीं डाल सकते न हिंदुत्ववादी ध्रुवीकरण से जनादेश पर बहुत फर्क पड़ने वाला. दलितों, पिछड़ों अल्पसंखयों और इसी तरह के वोट बैंक के सौदागरों का हश्र सबके सामने है, प्रदेश में सत्ता रहने के चलते सपा अपने कुनबे की सीट बचा पाया तो बसपा साफ ही हो गई. क्षेत्रीय क्षत्रपों में अगर ममता, जयललिता और नवीन पटनायक को सफलता मिली है तो यह उनकी अपनी छवि के चलते वरना क्षेत्रवाद को जनता ने बुरी तरह नकारा. इस जनादेश में शहर गांवों जिस तरह समान रूप से एकमत दिखा उससे लगता है कि गांवों तक राजनीतिक जागरूकता धर्म, जाति क्षेत्रीयता के नाम बर बंटॅवारे की राजनीति के प्रति अरुचि दिखने के अच्छे दिन आने वाले हैं.

भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जनता जब देती है तो छ्प्पर फाड़ कर देती है, शायद इस मौके पर उन्हें इसकी दूसरी लाइन कहनी ठीक नहीं लगी होगी कि जब वापस लेती है तो चमड़ी तक उधेड़ लेती है. जनता जनार्दन के हाथ इस तरह की ताकत आते देख लगता है, अच्छे दिन आ गए हैं.


भले ही अधिसंख्य युवा मतदाता राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हो, उसकी राजनैतिक सामाजिक समझ निराशाजनक हो पर यह एक शुरुआत है, इस जनादेश ने उसे अपनी ताकत का अहसास करा दिया है, आगे चल कर वह न सिर्फ परिपक्व होगा बल्कि जान जाएगा कि जिंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं. भले यह बात वह दस साल बाद समझे देश का भविष्य युवा हैं, वे ही सरकार से विकास , नौकरिया और दूसरे जवाब मांगेंगे, उतने ही आक्रामक अंदाज में जितने व्यापक रूप से उन्हें सपने दिखाए गए हैं. तो अब जवाबदेह राजनीति का आगाज होगा. युवा मतदाताओं और घोर प्रचार के चलते मतदान का बढता प्रतिशत इस बात का संकेत तो देता है स्वस्थ लोकतंत्र के अच्छे दिन आने वाले हैं.

जब इसी जनता ने यूपीए को दूसरी बार जिताया था तब भी वह उम्मीद से ही थी और आज भी है, और भले ही मोदी बेहतर करें या बदतर वह उससे बड़ी आशाओं के साथ उनके या किसी और के साथ कल भी उम्मीद से ही रहेगी. उम्मीद यहां का स्थाई भाव है क्योंकि आवश्यकताएं अनंत, अपेक्षाएं अनंत हैं जबकि राजनीतिक दल या नेता उम्मीदों पर आंशिक तौर पर भी खरे नहीं उतरते, हां नए सपने जरूर दिखाते रहते हैं सो आशाएं बनी रहती हैं, उम्मीदें मरती नहीं, एक के बाद एक अपेक्षाएं, खुशफहमी और इसके चलते स्वाभाविक सकारात्मकता बनी ही रहती है. अबकी बार मोदी सरकार” की टेर को जनता ने खूब सुना है.मोदी की मेहनत को तरजीह देते हुए बहुत समझबूझ कर मोदी को खंडित नहीं पूर्ण बहुमत दिया है. इस उम्मीद के साथ कि पूर्ण बहुमत और एक पार्टी की सरकार उनकी आशाओं को खंडित नहीं करेगी. अब गेंद मोदी के पाले में है. जनता को तो पूरा भरोसा है कि अच्छे दिन आ चले हैं, साबित मोदी को करना है.
इस बार के जनादेश को महज यह मानना कि यह एक पार्टी विशेष से ऊबी जनता ने दूसरी पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दे दिया है इसका बहुत सतही विश्लेषण होगा, इस जनादेश ने देश में उम्मीदों के बीज बोए हैं. अब अगर ये बीज ठीक से नहीं जनमे, पनपे और सुफल न दे सके तो जनता इससे भी जबर्दस्त पाटा चला कर फिर नए किस्म के बीज बोने की कला जान गई है. भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जनता जब देती है तो छ्प्पर फाड़ कर देती है, शायद इस मौके पर उन्हें इसकी दूसरी लाइन कहनी ठीक नहीं लगी होगी कि जब वापस लेती है तो चमड़ी तक उधेड़ लेती है. जनता जनार्दन के हाथ इस तरह की ताकत आते देख लगता है, अच्छे दिन आ गए हैं.

नतीजों पर चर्चा से पहले

संजय श्रीवास्तव



चुनावी परिणाम क्या होंगे इस पर अटकलों के लिए कल भर है. भूत हुए चुनावों के भविष्य पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है.




इतना तय मान लिया गया है कि वर्तमान सरकार जाएगी, एनडीए बड़ी ताकत बन कर उभरेगी. बदलाव अवश्यंभावी है, जनता ने इसी के लिए वोट दिए हैं और राहुल से लेकर रामदेव तक मोदी से लेकर मायावती तक सभी बदलाव की ही बात कर रहे हैं. कोई कुछ भी अक्षुण्ण बनाए रखने की बात नहीं कर रहा. सबके अपने अपने अपने ब्रांड के बदलाव हैं. 1952 से लेकर आज तक हर चुनाव में हमारे नेता बदलाव की बात करते हैं उसके दावों पर चुनाव लड़ते हैं, हर बार जो वह बदलाव लाना चाहते हैं वह भी बदल जाता है पर बदलाव का नारा है कि बदलता ही नहीं. इस बार भी बदलाव होगा. कांग्रेस और भाजपा पार्टी स्तर पर बदलेंगी, कुछ नेताओं के दिन बदलेंगे, सरकार बदलेगी, सरकार और सरकार में चेहरे बदलेंगे, चाल भी बदलेगी पर क्या सत्ता का मूल चरित्र भी बदलेगा? प्रशासन और आम जन का जीवन बदलेगा ? आने वाले नतीजों और उनसे उपजने वाले बदलावों पर बहस बाद की है सबसे पहले बदलाव के मूल कारक चुनाव पर चर्चा होना ज़रूरी है. इसके लिए भी बस आज ही बचा है. क्योंकि उसके बाद अगले चुनावों तक किसे समय है.
लोकतंत्र में मात्र चुनाव ही एक जरिया है जिससे सार्थक बदलाव लाया जा सकता है और अगर चुनाव के तौर तरीके, मतलब ही बदल जाएं तो जाहिर है पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अर्थ बदल जाएगा. इस बार का चुनाव पिछले कई चुनावों से बहुतेरे मामलों में अलग रहा. पहली बार बहुमत किसी पार्टी को दिलाने और सरकार व्यक्ति विशेष की बनाने की अपील की गई. चुनाव परिणामों पर असर डालने और चुनावी खर्च बेतहाशा बढा देने वाली इतना लंबी चुनावी प्रक्रिया भी देश ने पहली बार देखी भले ही उम्मीदवारों पर 70 लाख तक के खर्च का अंकुश पर चुनावी खर्च के मामले में पार्टियों का शर्मनाक तरीके से बेलगाम को भीषण खर्चना पहली बार दिखा. मीडिया और तकनीकि मिल कर कैसे गढते हैं भ्रमजाल, सशक्त तरीके से सामने आया.यह भी पहली बार दिखा कि दल विशेष की रैली में आईटी विशेषज्ञों की एक भरी पूरी टीम लैपटॉप, कैमरों, स्मार्ट फोन और इंटरनेट तथा दूसरे सरंजामों से लैस हो बाकायदा डेस्क बना कर उपस्थित हों और लाइव ट्रेंड, ट्वीटॅ किए जा रहे हों. साईबरी सेना का जनमत प्रभावित करने हेतु ऐसा सम्यक प्रयोग इतने बड़े स्तर पर दिखना नई परिघटॅना थी, यहां तक कि पोर्न साइटों पर भी पार्टी विशेष के पोस्टर जगमगा रहे थे.
चुनाव को एक ईवेंट के रूप में मैंनेज करना और अपने प्रबंधकीय कौशल से उस तमाशे को गंभीर बनाए रखने की कवायद भी पहली बार दिखी. खास तरह के कैमरे से सैकडों की भीड़ को जन सैलाब बना कर पेश करने और अपनी रैलियों, नेता के भाषण का फुटेज मीडिया को खुद मुहैया का कराने का प्रचलन और मीडिया द्वारा ऐसी सामग्री का आंखमूंद कर प्रकाशन प्रसारण भी पहली बार देखा गया.बेलगाम सोशल मीडिया पर अतिशय आक्रामक प्रचार और पार्टियों द्वारा उसका इस कदर व्यापक रणनीतिक इस्तेमाल पहली बार इस पैमाने पर हुआ. कारपोरेटॅ, थैलीशाहों के बिना लोकतंत्र चार दिन नहीं चल सकता हर चुनाव में इनकी भूमिका रहती है पर संकेत मिले कि वह भविष्य में मुखर, प्रखरऔर नग्न भूमिका में दिखेगा. लंबी चुनाव प्रक्रिया के चलते तहत हर दौर पर समीकरण बनते बिगड़ते दिखे और नेताओं ने कभी जानबूझ कर, कभी रणनीतिक तौर पर तो कभी बौखलाहट में विवादास्पद बयान दिए. चुनावी बहस का स्तर गिरा और चुनाव आयोग इस बार महज कागजी शेर बना रहा. शेषन से पहले का जमाना उनके जाने के इतनी साल बाद पहली बार दिखा.
देश में इस बार औसतन 10 प्रतिशत से 20 फीसदी तक मतदान बढ़ा है. इससे पहले का रिकार्ड महज 7 फीसदी का था. यहां तक कि ग्रेट निकोबार में रहने वाले पाषाण युग की अंतिम जीवित प्रजाति शोंपेन आदिवासियों के 60 सदस्यों ने भी वोट डाले. पहली बार कुल मतदाताओं के 20 फीसदी मतदाता युवा थे. युवा मतदान , ज्यादा मतदान लोकतंत्र की सेहत का सुखद संकेत है पर इसका कोई सीधा गणित नहीं है, इसके ठोस मायने निकालना निरर्थक है, कई उदाहरणॅ यह साबित करते हैं. यह देखना आवश्यक है कि आखिर ये संख्या क्यों बढी? दलों की बहुकोणीय मुकाबले, जाति , धर्म, संप्रदाय, अंधानुकरण और खेमेबंदी का आक्रमक प्रभाव जैसे इसके कई नकारात्मक कारण हो सकते हैं. युवा मतदाताओं की वजह से बढे मतदान कितना सकारात्मक और गुणॅवत्तापूर्णॅ है कहा नहीं जा सकता दुर्भाग्य से हमारे युवाओं को राजनीति से दूर कर दिया गया है और उसी का नतीजा है कि सर्वेक्षणॅ साबित करते हैं कि उनकी राजनैतिक परिपक्वता स्पष्ट रूप से संदिग्ध है. यह जरूर है कि मतदान शांतिपूर्ण हुए पर साथ ही यह बात एक बार फिर खुल कर सामने आई कि हमारी पुलिस किस कदर अप्रशिक्षित और गैर पेशेवर तथा निष्पक्षता से परे और नाकारा मानी जाती है कि महज 1,20,000 सुरक्षा बलों बल पर चुनाव कराने के चलते इतनी लंबी और खर्चीली चुनाव प्रक्रिया झेलनी पड़ती है.
1952 के चुनाव साढ़े दस करोड़ रुपए ख़र्च हुए थे जबकि 2014 में चुनाव आयोग लगभग 7,000 करोड़ रुपए ख़र्च कर चुका है. सभी दलों का तब सामूहिक खर्च तकरीबन 400 करोड़ था. अब तो एक पार्टी ही इससे कहीं ज्यादा खर्च कर चुकी है, कुल ख़र्च तो 40,000 करोड़ रुपए से अधिक ही बैठेगा. आखिर ये पैसा पार्टियां कहां से ला रही हैं, जो सरकार में हैं वे भ्रष्टाचार से, जो नहीं हैं ? यह पैसा किसका है. जाहिर है किसी पैसे वाले का. क्या वह यह पैसा राष्ट्र प्रेम में समर्पित कर रहा है या कीमत भी वसूलेगा. निस्संदेह पैसा व्यवसाय से आया है तो व्यवसायी कीमत क्यों न वसूलेगा.
पहली बार इस बात के साफ संकेत दिखे कि आगे से चुनाव पार्टियों के हाथ में नहीं रहेंगे. पार्टियां महज चुनाव आयोग से वास्ता रखेंगी और सारा काम इवेंट मैंनेज करने वाले और दिग्गज कॉरपोरेट के कॉरटेल करेंगे. हां मीडिया तथा जनता में चेहरा दिखाने और अपने दाता के सहयोग के लिए कुछ खास नेता रहेंगे. यह पूरा खेल प्रायोजित होगा. नेता अपने प्रायोजक का महज मोहरा होगा, पार्टी उसके वहां गिरवी. कार्यकर्ता इवेंट मैंनेजरों की सहायता करने, नारा लगाने, भीड़ बढाने, और झंडा ढोने के लिए होगा. जनता की भागीदारी महज टीवी, इंटरनेट और चौराहों पर थ्रीडी प्रचार देखने और नियत तिथि पर वोट देने की होगी, हो सकता है कि बूथ तक जाने की जहमत केवल सूदूर क्षेत्र के लोग ही उठाएं, घर बैठे मतदान की सुविधा दे दी जाए. चंद लोगों का समूह जो इस दंगल में अपनी अपनी प्रयोजित पार्टियों के पहलवानों को उतारेंगे वे जीत हार के बाद अपने पैसे दोगुने चौगुने कर के सरकार से वसूल लेंगे.
अब कल चुनाव परिणाम जो भी आएं, सरकार किसी की भी बने पर सबसे पहली चिंता लोकतंत्र की इस गंगोत्री की सफाई की होनी चाहिए. इसमे संदूषणॅ का अर्थ है दूषित जनमत. एक अवैध सरकार जिसके सरोकार जनता की बजाए किसी और से जुड़े हैं और वह परोक्ष रूप से उसी के लिए जवाबदेह और जिम्मेदार है. वह चुनी तो जनता द्वारा जाती है पर वे जनसेवक नहीं हैं. उसकी मालिक जनता नहीं, उनके आका थैलीशाह हैं वे उन्हीं के मतलब के कानून बनाती है, नियामक तय करती है. ऐसा अभी भी हो रहा है पर खुले आम नहीं पर तब खुले आम होगा. हो सकता है कि यह तथ्य किंचित आवर्धित, अतिरेकी लगे और समय से पहले भी, पर देश के चुनाव इस ओर जा रहे हैं भविष्य में इससे इनकार करना मुश्किल होगा सो इस चिंता पर चिंतन और चर्चा को देना हर लिहाज से वाजिब होगा. परिणामों पर बहस के लिए तो पूरा पखवारा पड़ा है.


महंगाई महाठगिनि हम जानी!

मोंटेक सिंह अहलूवालिया योजना आयोग के उपाध्यक्ष हैं, झूठ थोडे ही बोलेंगे, बड़े भारी अर्थशास्त्री हैं, निरर्थक तो भाखेंगे नहीं. वे कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे. उनका कहना है कि, ''मंहगाई नहीं, बल्कि लोगों की संपन्नता बढ रही है''. बड़े लोगों की बड़ी बातें छोटे लोगों के छोटे दिमाग में कैसे समातीं, कई मूढ़मति इसके गूढ़ार्थ को समझ नहीं पाए.
सीधी और सही बात है, समय के साथ साथ अपने उचित मूल्य पर बिक रही वस्तुओं को न खरीद पाने की खुद की अक्षमता को आप मंहगाई का नाम देते हैं फिर अपनी नाकामी का ठीकरा इसी स्वरचित मंहगाई के सिर पर फोड़ते हैं.

हर वक्त यह स्यापा कि पिछले दिनों इसी सीजन में फलां चीज 8 रूपए किलो थी आज 32 रूपए बिक रही है. महंगाई कितनी बढ़ गई है. यह बढ़्त कब और कैसे रुकेगी? कितने शर्मनाक और विकास विरोधी विचार हैं आपके, कितनी नकारात्मक आकांक्षाएं, अपेक्षाएं हैं आपकी, तिस पर आप चाहते हैं कि हम भी आपकी हां में हां मिलाएं? क्यों भई, क्यों? देश, समाज, कला, संस्कृति, फैशन, भ्रष्टाचार, अपराध सब तरक्की करें जबकि वस्तुएं तथा उनके दाम पीछे रह जाएं, स्थिर ही न रहें बल्कि और गिर जाएं. सकल घरेलू उत्पाद बढे, मगर उत्पाद के दाम कतई न बढ़े. क्यों न बढ़ें आखिर क्या पाप किया है उन्होंने? गजब की गिरी हुई सोच है आपकी.

लोग प्लॉट खरीद रहे हैं, आप प्याज तक नहीं खरीद पा रहे तो इसमें सरकार या किसी दूसरे का क्या दोष? आपकी कमाई और क्रयशक्ति नहीं बढ़ी, कम रही तो इसमें इनकी क्या गलती? अपनी बढोतरी न होने की फ्रस्टेशन, कुंठा में आप हर एक की तरक्की से चिढेंगे, चाहे वह नाचीज प्याज ही क्यों न हो. परसों राजा को गाली दे रहे थे, कल येदुरप्पा को कोस रहे थे, आज मंहगाई को. यह कहां का इंसाफ है, यह कहां तक जायज है. असल बात तो यह है कि आपके विचार ही प्रतिगामी हैं, आप प्रगति के विरोधी, उसकेप्रति स्वाभाविक तौर पर इर्ष्यालु हैं.
बड़े साहब को देखिए, कभी मंहगाई को कोसते हुए दिखते हैं, नहीं न. वे पिछले तीन साल में पद और पैसे के मामले में पांच पायदान ऊपर चढे हैं, आप से लोगों ने कहा कि काम ही करते रहोगे तो आगे कब बढोगे? पर आप तो काम ही करते रहे, कुछ और किया ही नहीं, अब अपनी अकर्मणयता को स्वीकारने की बजाए सारा दोष मंहगाई पर मढ़ रहे हैं. सही है, हारे का हरिनाम है मंहगाई, सोचिए जरा, हारी भाजपा मंहगाई पर कितना हल्ला बोल रही है, कामयाब कांग्रेस क्या कभी इस पर कोई कान दे रही है?

मोंटेक कुछ भी गलत नहीं कह रहे. यह आपकी अविकसित समझ का फेर है, आप महंगाई का मतलब भी जानते हैं? मुझे तो नहीं लगता जानते होंगे. मायावी मंहगाई की माया को समझना इतना आसान नहीं. अगर आप आर्थिक तकनीकि शब्दावलि के मुद्रास्फीति शब्द का मतलब मंहगाई मानते हैं, तो आप गलती पर हैं. इससे मंहगाई का मतलब तो है लेकिन यह इसका सटीक अनुवाद नहीं. मतलब मुद्रास्फीति माने म्हंगाई कतई नहीं. मंहगाई स्फीति से कुछ अलग है. वैसे भी इस स्फीति या सूजन में आपको दर्द का भी अनुभव होता है और यह बेदर्द भी होती है. दूसरी किसी सूजन की तरह थोड़े ही दिनों में तो नहीं उतरती पर हां, चली तो जाती ही है फिर आने के लिए. महंगाई एक सापेक्ष शब्द है. मोबाइल के सापेक्ष मटर मंहगी हो रही है तो प्याज के बरअक्स आपको वही मटर कम मंहगी होती लगेगी यहां तक की मोटर भी. प्याज के दाम 150 फीसद बढे हैं, मोटर के तो 15 फीसद भी नहीं.
महंगाई एक मायावी शब्द है जिसके मायने हर आदमी के लिए अलग अलग हैं. मंहगाई का मतलब झाऊ लाल चपरासी की बीवी के लिए अलग हैं तो बडे बाबू के लिए अलग, साहब के लिए भिन्न तो बडे साहब के लिए एकदम अलग. किसी किसी के लिए तो यह शब्द नहीं समूचा जीवन और जीवन शैली है तो किसी किसी के लिए ऐसा कोई शब्द ही नहीं तो उसके मायने वे क्या जानें.किसी किसी के लिए यह शब्द सुना हुआ तो है पर न उसके मायने पता हैं न उसका अहसास, मंत्री महोदय या मोंटेक सिंह के लिए मंहगाई के मायने निस्संदेह आम से अलग होंगे. जाकी रही भावना जैसी, मंहगाई मूरत देखी तिन तैसी.

तो, मंहगाई सापेक्ष, तुलनात्मक, बहुअर्थी, शब्द तो है ही यह भ्रामक और आभासी भी है. अब इस शब्द का जो आभास आपको है, वह शरद पवार को नहीं हो सकता, जो शरद पवार को है वह आडवाणी को नहीं और जो बडे बाबू को है वह रिक्शाचालक राधेलाल को नहीं. कबीर बाबू होते तो इस मायावी शब्द मंहगाई रूपी माया के माहात्म्य में कुछ यूं लिखते .....

मंहगाई महाठगिनि हम जानी.
नेता के घर सोना हुई बैठीं,
जनता के घर कौड़ी कानी!
जमाखोर के घर समरिधि हुई बैठीं,
बाबू के घर बेईमानी!
मंहगाई महाठगिनि हम जानी
.
भाजपा के घर मुद्दा हुईं बैठी,
यूपीए के घर परेशानी!
महंगाई महाठगिनि हम जानी.

उफ्फ! ये आलमे बदहवासी

संजय श्रीवास्तव
चुनावी चरणों के चलते उतारचढाव ने दलों और दलपतियों को में तमाम तरह की आशंकाएं बो दी हैं. सभी अपने अपने स्तर पर आशंकित हैं या असमंजस में, उनकी यह हताशा इस अखिरी दौर के उनके बात व्यवहार से साफ जाहिर हो रही है चुनावी चरण अब मंजिल की ओर बढ चले हैं, बस कुछ ही दौर बाकी हैं. मतदान के दौर खत्म होने से ठीक पहले का यह मंजर है कि हर दल आशंकित नजर आता है, हताशा चहुंओर है कहीं कम कहीं ज्यादा. यह देखते समझते कई बदहवास हैं तो कितने ही बदजुबानियों पर उतर आए हैं. चुनाव आयोग की लंबी चुनाव प्रक्रिया ने हमारे अधैर्यशील नेताओं के धैर्य की बड़ी कठिन परीक्षा ली है, चुनाव में तो कोई एक पास हो जाएगा पर अंकगणित सबकी गड़बड़ाई हुई है और कोई भी आश्वस्त नहीं दिखता. मीडियाई सर्वेक्षणों के अनुसार स्पष्ट बहुमत के साथ मोदी सरकार बनाने की आश्वस्ति हासिल कर चुकी भाजपा हो या बड़े ठसके के साथ उससे अलग हुआ जद यू. सबसे पुरानी और सर्वाधिक अनुभवी नेतओं से भरी कांग्रेस. सपा, बसपा हो या वामपंथी, तीसरे मोर्चे के अन्य घटक दल अथवा तृणमूल कांग्रेस. चुनावी चक्रों के बीते दौर से हमारे अनुभवी और चतुर नेता बूझ चुके हैं और अनुमान लगा चुके हैं कि इस चुनावी ऊंट की कौन सी कल सीधी होगी, यह किस करवटॅ बैठेगा, भले ही यह उनका अनुमान ही हो और नतीजे इससे अलग हों पर उनका व्यवहार बताता है कि वे सीट सीटॅ और राजनीति के घाट घाट का पानी पीने के बाद क्या सोच समझ रहे हैं. यह सोच समझ हताशा निराशा, बदहवासी पार्टी स्तर पर भी परिलक्षित हो रही है तो व्यक्तिगत स्तर पर भी. मीडिया के जरिए रात दिन जनता यह देख पढ समझ रही है. उसे भी इसके आधार पर आगत का अनुमान लगाने का मौका मिल गया है.वह तमाम दलों की बेचैनी और चढते उतरते पारे को खूब देख समझ रही है. कांग्रेस हताश है. उसके अगुवा राहुल कहते हैं, अगर पर्याप्त सीटें नहीं आईं तो विपक्ष में बैठेंगे किसी को समर्थन नहीं देंगे. यानी कि आगत की आहट उनको अभी से है. कांग्रेस बीच चुनाव में पूरक घोषणा पत्र जारी करती है और पिछ्ड़े मुसलमानों को आरक्षण की घोषणा करती है यो यह बस जमीन बचाने और हारते हारते कुछ और हासिल कर लेने की हताशापूर्ण कवायद से ज्यादा क्या है, जाहिर है दस साल में किए गए यूपीए के काम और चुनाव के ठीक पहले जारी अपने घोषणा पत्र पर उसको पूरा यकीन नहीं है कि इसके आधार पर उसको काम भर के वोट मिल पाएंगे. वह अचानक ही चार सौ से भी ज्यादा भाजपाई घोटालों के बाहर लाती है, मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत हमले ही तेज नहीं करती, मोदी पर एफआईआर से उसे संतोष नहीं होता. अनन फानन महिला जासूसी कांड की जांच के लिए अवकाशप्राप्त न्यायधीश तलशने में जुट जाती है. अमेठी में विकस की कमी राज्य सरकार पर थोपती है और उसके नेता बदहवसी में ऊलजलूल बयान पर उतर आते हैं ऐसे बयान जो एक समय विशेष पर तो खास मायने रखते पर इस समय वह बदहवासी से उपजे बयान ही माने जाएंगे वह चाहे सिब्बल बोलें या अय्यर अथवा चिदम्बरम और यहां तक कि राहुल ही क्यों न हों. उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 से ज्यादा सीटें किसी भी आम चुनाव में बहुत असर रखती है. बिहार में नीतीश कुमार की निराशा टीवी के पर्दे पर साफ झलकती है. वे कहते हैं कि वे चुनाव जीत हार के लिए नहीं महान उद्देश्य और बेहतर सरोकार को लेकर लड़ रहे हैं. कांग्रेस के खिलाफ बुरी तरह आक्रोश है अगर भाजपा साथ होती तो भारी मात्रा में भुनाते मगर अब भाजपा रही कहां वहां तो महज मोदी जपा ही है. खैर, सभी पार्टियां महान उद्देश्य और उच्चतम सरोकारों के नाम पर ही चुनाव लड़ती हैं और जीत की अपेक्षा रखती हैं. नीतीश इस बात से हताश हैं कि जातीय समीकरण का खेल का तीर उनके पिछ्ले जीतों को तुक्का न साबित कर दे. सारे देश में विकास के नाम लड़े जा रहे चुनाव में बिहार का विकास पुरुष कहीं का न रहे. जात और भात दोनो गंवा चुके नीतीश के तेवरों से साफ है कि उनका तीर निशाने पर नहीं लग रहा. सर्वेक्षणों के अनुसार बिहार में नितीश तीसरे स्थान पर हैं अब भाजपा उसके साथी तथा राजद कांग्रेस से जो कुछ बचेगा उसी से उन्हें संतोष करना पड़ेगा. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सक्रिय राजनीति के संभवत: इस अखीरी दौर में जिस कदर बयान दे रहे हैं उससे साफ लग रहा है कि या तो वे शरीर और दिमाग से थक गये हैं या फिर नतीजे उनके उम्मीद से बहुत ज्यादा अलग आने वाले हैं, मायावती पर दिए गए बयान, बलात्कारियों के खिलाफ सख्ती से परहेज या मुस्लिम तुष्टीकरण की चालों से कुछ बातें साफ हैं. एक तो वे प्रदेश में भाजपा के बढते प्रभाव और उसकी आने वाली संभावित सीटों की संख्या से आतंकित हैं दूसरे केंद्र में आ सकने वाली सरकार की आशंका से भी, उधर बसपा बिना कोई शोर मचाए अगर नंबर दो पर रहती है तो सपा के लिए अगले विधान सभा चुनाव के बाद का बनवास कितना लंबा होगा कौन जाने. इस हताशा का असर उनकी जुबान से दिखता है. मायावती भी कम हताश नहीं हैं सपा को तो भले ही किसी भी अर्थों में कोई पूछ भी रहा है बसपा का तो उनके कोर वोटर और कत्र समर्थकों के अलावा कोई नामलेवा ही नहीं है इस बार . उधर ममता भी कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं हैं, भले ही ऐसा लगता है जैसे भाजपा ने खुले आम आमंत्रण दे कर उनका भाव बढया हो पर दर असल यह उनको एक्सपोज करने की चाल है, हतोत्साहित करने वाला सियासी कदम यह वह बखूबी जानती है. ममता एंटी एकैंबेंसी फैक्टर से आशंकित हैं तो थोड़ी बहुत मोदी की ललकार से भी. मामता इस लिए भी थोड़ी बदहवासी में हैं कि दो हफे से भी कम समय में परिणाम समने आने वाला है पर जाना किधर है यह अभी भी तय नहीं. इस चुनाव को सबसे बेहतर प्रबंध शैली, शानदार, लागत और तकनीकि तथा सूचना तंत्र के भरपूर उपयोग में कांग्रेस को कोसों पीछे छोड़ देने वाली भाजपा मे हर ओर सत्साहस है, वह जोश और सुनहरे भविषय के सपने तथा उम्मीदों से लबरेज है, ऐसा भी नहीं है. यहां हताशा दूसरों से थोड़ी कम हो पर चुनाव के आखीरी चरणों तक पहुंचते पहुंचते पार्टी स्तर पर और व्यक्तिगत तौर पर दोनो ही मामले में निराशा, हताशा साफ दिखने लगी है. मतदान के पहले दूसरे दौर तक सर्वेक्षणों ने यह घोषित कर दिया कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है पर अब कई दिग्गज भजपाई भी स्वीकारते हैं कि बिहार में संघर्ष द्विपक्षीय है, दूसरा पक्ष राजद और साथी कांग्रेस गठबंधन है. भाजपा को न तो बिहार में उसको पूर्वापेक्षित सीटें मिलने जा रही हैं न ही उत्तर प्रदेश में, दक्षिण में भी जो अनुमान था उससे कम ही मिल रही हैं. आकलन से बहुत ज्यादा कमे हुई तो मोदी के नाम पर साथी ढूंढने मुश्किल होंगे और समझौता करना सब किए पर पानी फिरने जैसा. मोदी का मतदान के बाद प्रेस कांफ्रेंस और कमल निशान दिखाना इसी हताशा से उपजा कृत्य था. अंतिम दौर में भजपा का बेहद आक्रामक हो जाना और सारी ताकत झोंकना इस आकलन को सही बताता है कि भाजपा को मनोवांछित संख्या नहीं मिलने जा रही.मुस्लिम मतों का ध्रुवी करणॅ और सवर्णों को एकमत करने की दो पाटों की राजनीति का नतीजे क्या निकलेगा अब आखिरी दौर में इस पर उसे सोचना पड़ रहा है.उधर भाजपा को वोट देना खुदा, लौम और देश से गद्दारी है जैसे अपने बयानों से केजरी की हताशा साफ झलकती है. भाजपा में तो पार्टी स्तर के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी हताशा साफ झलकते है. राजनाथ सिंह का यह दुहराता हुआ बयान कि हर हाल में मोदी प्रधान मंत्री होंगे, मैं सरकार में शामिल नहीं रहूंगा, सत्ता के दो ध्रुव नहीं बनेंगे यह बातें उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाबों और सियासी तिकड़मों के जग जाहिर होने के बाद हास्यास्पद तौर पर उनकी व्यतिगत निराशा की नुमाईंदगी करता है. उधर उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी के बयान भी बताते हैं कि वे सहज नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर देखा जाए तो बस एक ही शख्स है जो तटस्थ है और न हताश है न निराश, शायद उसने कोई आशा पाल ही न रखी हो , वह हैं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. लगता है इस चुनाव बाद वह अंतरतम में यह बुदबुदाते हुए मिलें,’ भला भया पीएम पद गया, जां से छूटी बलाय, जने जने का रूठना मो सो सहा न जाए’.

अच्छे दिन आने वाले हैं

संजय श्रीवास्तव
टीवी पर एक विज्ञापन की पंक्तियां बड़े ठसके के साथ उभरती है. ‘’ अच्छे दिन आने वाले हैं, हम मोदी जी को लाने वाले हैं. ‘’ विज्ञापन खत्म होते ही ठीक दूसरे विज्ञापन में दबंग सलमान खान नजर आते हैं जो एक शीतल पेय के प्रचार की टैग़ लाइन अपने खास अंदाज में बोलते हैं,’’ एक तूफान खत्म हुआ तो दूसरा शुरू तूफान करो मेरी जान.’’ दोनो ही विज्ञापन हैं विज्ञापनों का सच से कितना वास्ता सबको पता है. पर यहां सवाल विज्ञापनी दावे के गलत होने का नहीं बल्कि सच होने का है. यह तो सच है कि भारतीय जनता के लिए चुनावी राजनीति का मतलब और फसाना अब तक यही रहा है,‘’एक धुंध से आना है और एक धुंध में जाना है’’ फिर एक तूफान के बाद दूसरा शुरू होने में शक कम ही है. हां तूफान की तासीर बदल सकती है. पर पहली और अव्वल बात कि क्या वाकई अच्छे दिन आने वाले हैं? अगर आने ही वाले हैं अच्छे दिन तो फिर सबके या हमेशा की तरह कुछ खास लोगों के या फिर किसके? मोदी जी को लाने, मोदी सरकार बनाने के बाद अच्छे दिन आने वाले हैं यह बात जितने आत्मविश्वास और दिल से रामविलास पसवान कह सकते हैं क्या उतनी ही साफगोई से राजनाथ भी अपने बारे में कह सकते हैं. यह तय हो सकता है कि सतपाल महाराज के दिन बहुरें पर क्या मुरली मनोहर जोशी के दिन नहीं बिगडेंगे. जेतली, अमित शाह के लिए जितने अच्छे दिनों की कल्पना की जा रही है क्या सुषमा और आडवाणी भी उसी तरह के सुनहरे दिनों के ख्वाब बुन पाएंगे. एक बार किसी तरह से उबरी उमा के दिन स्थिर रहेंगे? जो दिन एमजे अकबर और बलबीर पुंज के बदलेंगे क्या वैसे ही दिन क्या कुछ कांग्रेसी जर्नलिस्टस के भी होंगे, पार्टी पट्टाधारी पत्रकारों, कलमकारों का जो भी हो आज़ाद कलमकारों के दिन कैसे होंगे वह हमेशा की तरह आशंकाग्रस्त ही रहेगा या कि बदलेगा? संघ समर्थित अथवा कुछ दक्षिणपंथी सोच विचार वाले सामाजिक कार्यकर्ता, थिंक टैंको के लिए जो अच्छे दिन आने वाले वाले है क्या वैसे ही दिन तीस्ता सीतल्वाड या अरूंधती राय या रामचंद्र गुहा जैसे कईयों के लिए भी होंगे? रामदेव को भले लगे कि अब अच्छे और राहत भरे दिन आने वाले हैं, पर काग्रेसी संतों, शंकराचार्य और मठाधीशों से जरा उनके दिल का हाल पूछिए? सपाइयों, बसपाइयों को छोड़ दें तो इस अच्छे दिन की आशंका से बेहद डरे हुए अल्पसंख्यकों में से बहुसंख्यकों की क्या राय है किसी ने जानने की कोशिश की है? निराशावादी बनना अच्छी बात नहीं, हो सकता है मोदी मंत्र कुछ काम कर जाए और एक बेहद अकर्मण्य सरकार के जाने के बाद कुछ बेहतरी दिखे और अच्छे दिन आने के संकेत मिलें पर क्या गैर भाजपाई इसे स्वीकारेंगे? जब तक वे सत्ता में न हों या सत्ता के सहयोगी न बनें उनके लिए अच्छे दिनों का कोई अर्थ नहीं. यह हाल इन पार्टियों के नेताओं का ही नहीं उनके लाखों की संख्या में फैले समर्थकों का भी है आखिर दिल्ली के दस साल के विकास से भाजपा नेता सहमत नहीं थे तो क्या कोई भाजपा समर्थक यह कहता मिलता था कि हां तमाम सड़्कें, सुविधाजनक बसें, ओबरब्रिज और मेट्रो शीला सरकार की देन है. या फिर गुजरात का कोई कांग्रेसी समर्थक स्वीकारेगा कि वहां धुंआधार विकास हुआ है. जाहिर है ऐसे लाखों लोगों के लिए जो भाजपाई नहीं है उनके लिए अच्छे दिन आ कर भी नहीं आने वाले हैं. अब यह जाहिर है मोदी के सत्तासीन होने के बाद भाजपा और उसके नेता लाख यह दावा करते फिरें कि देखिए बस अच्छे दिन आने वाले हैं या आ ही गए हैं, भले यह सियासी सच भर हो और सत्यता से इनका दूर दूर तक कुछ भी लेना न हो पर वे दलगत मजबूरी या मोदी भय से यह दुहराएंगे, उसके साथी दल हां में हां मिलाएंगे, कोरस गाएंगे. हो सकता है दूसरे दलों से गए मौकापरस्त और अब उपेक्षित तथा इनके अलावा असंतुष्ट भाजपाईयों को भी दिखने लगे कि अच्छे दिन तो आए नहीं. अब इसमें मोदी का क्या दोष? जो काम बासठ साल में कांग्रेस नहीं कर पाई और उस काम को मोदी तुरंत कर गुजरें यह कहां संभव है पर इस हो हल्ले से यह तो साबित हो ही जाएगा कि सबके दिन अच्छे नहीं. मान के चलिए कि फिलहाल इतनी जल्दी अच्छे दिन उनके भी नहीं आने वाले जो पीढियों से बेहद गरीब हैं, अशिक्षित , भूखे, बेकार, बीमार, लाचार हैं. दो एक दशक का ईमानदार और सही दिशा में प्रयास ही इनके अच्छे दिन ला सकता है और जो बेहद अमीर हैं उनके अच्छे दिन मोदी के आने से बुरे नहीं होने वाले उनको इस नारे से कोई मतलब नहीं. हां एक बड़ा मध्यम मध्यम वर्गीय तबका इसकी बाट जोह सकता है यह अलग बात है कि वह हर बात में मीन मेख निकालने वाला होता है. नकारता ज्यादा है, स्वीकारता कम है. यह बड़ी मुश्किलों के बाद ही स्वीकारेगा कि अच्छे दिन आ गए हैं. आटा सस्ता हो गया पर गैस तेल तो वहीं पर हैं, काश मोदी ने गैस कीमतों पर....... तो क्या अच्छे दिन आखिर किसके आने वाले हैं. मोदी विरोधियों और कुछ नकारात्मक सोच वालों की मानें तो मोदी और कुछ उनके अंध समर्थकों तथा अवसरवादियों के. विकास की गुलाबी तस्वीर तैयार करेने वाले आंकडेबाजों के, जतियों धर्मों के नाम पर साजिश कर विद्वेष फैलाने वालों के, धर्म - संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों के, जमाखोरों काला बजारियों के, शहरी कारोबारियों के, किसानों का शोषण करने वाले आढतियों बिचौलियों के, मीडिया और तकनीकि का सहारा लेकर सियासी बगूला तैयार कर सकने में समर्थ बाजीगरों के या फिर अरबों खर्च कर चुनावी लीग खिलवाने वाले दिग्गज कारपोरेट्स के. भले ही बात पूरी तरह सच न हों पर इनकी बात में दम तो लगता है. तो क्या बस मुट्ठी भर इन्ही लोगों के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं.? चुनावों से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक उद्बोधन में हमेशा की तरह बड़ी गंभीरता से कहा था ‘ अच्छे दिन वाले हैं” राष्ट्रीय पटल पर उभरे मोदी ने उस वाक्य पर चुटकी लेते हुए मजाकिया लहजे में कहा था,: हां प्रधानमंत्री जी सही फरमा रहे हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं, बस चुनाव होने तक इंतज़ार कीजिए. यह बात शुरुआती तौर पर तंज करते हुए मजाक में कही गई थी पर जैसा कि कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सभी पार्टियों में चलन है नेता के मुख से निकला सब कुछ सुभाषित ही होता है, मोदी के मुखारबिंद से निकला यह वाक्य ब्रह्मवाक्य ही नही नारा बन गया. अब आशंका इस बात की है कि मजाक से जनमा यह सूत्रवाक्य आने वाले समय में कहीं देश के लिए गंभीर मजाक न बन जाए और लोग इसे नमक की तरह न इस्तेमाल करें, नाकाम, बदहाल, बेकार लोगों का उपहास उड़ाते हुए लोग यह कहते हुए न सुने जाएं कि तुम्हीं तो रटते फिरते थे अच्छे दिन आने वाले हैं. सत्तासीन होने के बाद कभी गरीब चाय बेचने वाले मोदी को किसी का ख्याल रहे न रहे पर इन गरीबों, बेकारों बदहालों और हाशिए पर पड़े लोगों का ख्याल जरूर करना होगा. इनके अच्छे दिन न भी आएं तो कोई खास बात नहीं, वे किसी भी सरकार में नहीं आए पर दिन और बिगड़ने न पाएं यही बहुत होगा.

वाकई ऐतिहासिक है यह चुनाव

भय, भूख और भेदभाव रहित समतामूलक समाज का सपना दिखाने वाली राजनैतिक पार्टियां जिस तरह भय पैदा करने, बदला भुनाने, धमकाने के लिए जुबानी जंग में लटपटॅ बयानबाजी के लट्ठ भांज रही हैं उससे यह चुनाव ऐतिहासिक बनता जा रहा है
इस बार का चुनाव ऐतिहासिक है. पहली बार नहीं है कि जन सेवक जन सेवा के लिए इतने इस कदर और इस हद तक उद्धत हों, वे हर रोज वे अपने मालिकों को धमाका रहे हैं कि इस बार सेवा का अवसर नहीं दिया तो अंजाम देख लेना, तुम्हारे रोजी रोजगार के जो कुछ दरवाजे खुले हैं वो बंद करने में देर नहीं लगेगी, दाना पानी मुहाल कर देंगे, यह पहली बार हो रहा है. ये जन सेवक हर कीमत पर अपने जन की, अपने मतदाताओं की सेवा करना चाहते हैं. उनकी सेवा भावना का यह उत्कर्ष अनुकरणीय है इसीलिए सभी पार्टियां इस मामले में एक दूसरे का होड़ करती हुई अनुकरणरत हैं. दरअसल असली मुसीबत यहीं है न सेवा करने में कोई पीछे रहना चहता है, न धमकाने में. मुलायम सिंह यादव बुलंदशहर में सरकारी स्कूलों में शिक्षक की नौकरी के उम्मीदवारों को धमका आते हैं कि वोट नहीं दिया तो योजना ठंडे बस्ते में चली जाएगी. जाहिर है कि अनुभवी मुलायम भले ही पुराने पहलवान रहे हों पर इतना तो जानते ही हैं कि अध्यापक समझदार प्राणी हैं, सभी टीचर तो ट्यूशन पर गुजारा नहीं कर सकते, फिर सरकारी नौकरी के आगे एक वोट की क्या हैसियत, नौकरी स्थाई है, चुनाव तो हर पांच बरस पर आते हैं, और सरकारें तो खैर आती जाती रहती हैं. शाश्वत सरकारी नौकरी पर नश्वर वोट का बलिदान कोई बड़ी बात नहीं, इसीलिए पढे लिखे समझदार शिक्षकों पर उनकी धमकी जरूर असर कर जाएगी. धमकी तो सपा के आजम खान भी देते हैं इनके धमकी देने का अंदाज थोड़ा न्यारा है और धमकी का फलक कुछ ज्यादा ही विस्तृत. ये धमकी ही नहीं देते भय भी पैदा करते हैं और भेद भी. यही हाल भाजपा के अमित शाह का भी है वे भी खुले आम धमकी देते हैं, एक पक्ष को आक्रांत तो दूसरे को भयाक्रांत करते हैं, दोनो का मकसद एक है, इस बार अगर उनकी पार्टी को थोक में वोट देकर नहीं जिताया तो अंजाम बुरा होगा. यह अलग बात है कि अगर जिता दिया तो एक दूसरे पक्ष को लगता है कि उसके बाद अंजाम शायद उनके लिए और बुरा न हो जाए. एनसीपी के अजित पवार महाराष्ट्रके जिस संसदीय क्षेत्र से उनकी उनकी बहन सुप्रिया सुले चुनाव लड़ रही हैं वहां के गांव वालों को एक रात धमका आते हैं कि अगर उनकी बहन को वोट न दिया तो पानी को तरस जाओगे. मीडिया पर हो हल्ला मचने पर अजित कहते हैं यह मैं नहीं था न मेरी आवाज पर देखने सुनने वाले यही कह रहे हैं कि यह अजीत की ही आवाज है और उनका इतिहास इस बारे में जो कहता है उससे उनसे इस तरह की उम्मीद की जा सकती है. भयादोहन या ब्लैकमेल के जरिए मताखेट वाला यह चुनाव वाकई ऐतिहासिक है. अब मुलायम सरीखे खांटी और पुराने नेता सीधी बात कहते हैं और लोगों की समझ में आ जाता है कि यह तो सरासर और सीधे सीधे धमकी हुई, पर प्रियंका गांधी सरीखी पढी लिखी, परिष्कृत महिलाएं ऐसा नहीं करतीं वे जनता को धमकाने के अनूठे और परोक्ष उपाय अपनाती हैं, बंदूक किसी और के हाथ होती है, नली विरोधी प्रत्याशी की ओर और निशाने पर आम वोटर. एक अतिउत्साही समर्थक कहता है कि वह राहुल के विरोधी प्रत्याशी को गोली मार देगा, प्रियंका उसे डांटने और उसके खिलाफ कोई कार्यवाई की बजाए जो कहती करती हैं उससे संकेत जाता है कि जनता समझदार है खुद ही समझ ले कि जो विरोधी पक्ष को मत देगा उसका पार्टी और उसके समर्थक क्या गत करेंगे. यही हाल नेशनल कांफ्रेंस के महावरिष्टह नेता फारूख अब्दुल्ला का है जो अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को सीधे सीधे हमले और अंजाम भुगतने की धमकी देते हुए जनता को यह बताने की कोशिश करते हैं कि निजाम उनके हाथ है, उन्हें के हाथ रहे तो बेहतर. उधर देश की राजनीति को बदलने, लोकतंत्र को लोक के नजदीक पहुंचाने तथा भ्रष्टाचार के समूल नाश का प्रण लिए केजरीवाल धमकाते हैं, लोकतंत्र खतरे में है, इस बार उनको उनकी पार्टी को वोट नहीं दिया तो फिर भगवान अगली बार मौका नहीं देगा, भुगतते रहना भाजपा, कांग्रेस को बदल बदल कर. यह मतदाता में भय पैदा करने का अलग ही अंदाज है. भय भूख और भेदभाव रहित समतामूलक समाज का सपना दिखाने वाली राजनैतिक पार्टियां जिस तरह बदला भुनाने की बात कर रही हैं और जुबानी जंग में लटपटॅ बयानबाजी के लट्ठ भांज रही हैं उससे यह चुनाव ऐतिहासिक बनता जा रहा है. पहले पार्टियों के गुर्गे उनके इशारे पर बूथ कब्जा लेते या लूट लेते थे, जनता को वोट के लिए धमकाने की जरूरत ही नहीं थी, अब संभव नहीं. फर्जी वोट अब भी पड़ रहे हैं पर सीमित संख्या में, जनता को अपनी रैलियों में मनगढंत आंकडे, खुद का बनाया इतिहास- भूगोल और तरक्की की कहाँनियां बताना, पढाना अब आसान नहीं क्योंकि घर घर टीवी, इंटरनेट मोबाइल अखबार पहुंच गया है. जनता सूचना के इस महा विस्फोट और मीडियाई प्रभाव के साथ साथ शिक्षा के सामान्य प्रसार के चलते किंचित जागरूक है, वह किसी के द्वारा भ्रमित होने वाली नहीं अलबत्ता खुद अपनी शर्तों पर अपने आप भ्रमित होना उसे मंजूर है. सो बयानों भर से जनता को बरगलाना अब बेहद कठिन है उधर चुनाव आयोग ने चुनावी खर्चों पर लगाम कस रखी है. ऐसे में मतदताओं को लुभने के लिए साम दाम का रास्ता तो मुश्किल है ऐसे में महज दंड , भेद का ही सहारा है. धन नहीं दे सकते तो धमकी ही दे रहे हैं नेता. भाव नहीं दे पा रहे तो भेद ही उपजा रहे हैं. किसी न किसी विधि मत का मिलना होय. नेतृत्व की यह लाचारगी और नैतिक दिवालियापन वाकई ऐतिहासिक है. बिलबिलाए नेता बावले हो रहे हैं जो छात्र साल भर मेहनत नहीं करता वह परीक्षा के दिनों में परेशान और अधीर हो उठता है हताशा में अनुचित साधनों संसाधनों के जरिए इस वैतरणी के पार लगने पर भरोसा करने ही नहीं लगता उसका इस्तेमाल भी करता है. ज्यादातर नेताओं की गत यही है. पहले एक ही पार्टी तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार कह कर कुछ खास लोगों को ही और सीमित संख्या में जूते मारने की बात कहती थी अब चहुंओर से जूते बरस रहे हैं और लोग सौ सौ जूते खाएं तमाशा घुस के देखें वाले अंदाज में पूरे उत्साह और जोश खरोश से लोकतंत्र के इस महायज्ञ में भाग ले रहे हैं और समिधा स्वरूप अपने मतदान मतमशीन को अर्पित कर रहे हैं, बढ चढ कर धुंआधार मतदान कर रहे हैं, इस प्रत्याशा में कि इस बार तो बदलाव हो कर रहेगा. जनता जिस तरह सकारात्मक रुख लेकर अपने मत प्रयोग के लिए मतातुर है उसे देख समझ कर यही लगता है कि भले ही राजनैतिक दल और उसके अधिकांश नेता लोकतंत्र को रसातल में पहुंचाने की कोशिशों में जी जान लगा दें देश की इतनी उत्साही है कि अपने सदप्रयासों से आज नहीं कल उसे रसातल पहुंचने से पहले खींच लाएगी. इस महान आशावादिता के उदय के मायने में यह चुनाव ऐतिहासिक है. अंत में सबसे कमाल की और महत्वपूर्णॅ बात यह कि सारे नेता, सभी पार्टियां एक दूसरे को आश्वासन देती आ रहीं हैं कि वे जीते तो विरोधी, विपक्षी के खिलाफ दुर्भावना या बदले की भावना से कोई कार्यवाई नहीं होगी. वह चाहें मोदी हों या राहुल, मायावती हों या मुलायम. इस अमामले में सभी जन एक हैं. यानी अपने पूर्व धतकर्मों के लिए पश्चाताप या डरने की जरूरत नहीं तुम्हें मौका मिला तुमने किया, हमें मिल रहा है हम करेंगे. न हम तुम्हारी पोल खोलेंगे न तुम हामारी खोलना. सत्ता की ताकत का सदुपयोग सकारात्मक रूप से पनी प्रगति के लिए करना न कि नकारात्मक तौर पर दूसरे की जड़ें खोदने के लिए. यानी सारी सद्भावना, सहिष्णुता, राजनीति की कोख से जन्मीं सियासी बहनों सरीखी पार्टियों से प्रसूत इन विभिन्न दलों के नेता रूपी मौसेरे भाइयों के बीच और हर तरह की वितृष्णा, धमकी , भेदभाव जनता के नाम. वास्तव में यह चुनाव ऐतिहासिक है, शायद इसलिए भी कि अगर इसबार जनमत की अवहेलना हुई तो अगली बार जागरूक जनता इस चुनाव को इतिहास के कूड़ेदान में डाल देगी. संजय श्रीवास्तव

लहूलुहान लौहपुरुष

संजय श्रीवास्तव
संघ के वरिष्ठ आडवाणी और अटल को पार्टी का जुड़वा बैल मानते आए हैं, वे इन्हें अलग अलग क्या मानते हैं यह तो पता नहीं, फिलहाल आडवाणी अकेले पड़ गए हैं और पार्टी की गाड़ी खींचने से भी दरकिनार हैं. बैठे बैठे पगुराने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है.
अमूमन चुनौतियां देते, चीखते लौहपुरुष आज चुप थे. चोर निगाहों से टीवी स्क्रीन पर निगाह फेर नजर तुरत हटा लेते थे. साथ बैठे सियासी प्रबंध, प्रपंच और प्रचार के महारथियों को मालूम हो चला था कि वे मुगालते में थे, खिली बांछों के साथ घूमने वाले बगलें झांकने के लिए मजबूर थे. उनके कई सिपाहसालार शराब सीख पर ड़ाली कबाब पैमाने में जैसी खब्तुलहवासी की हालत में थे. अधिकतर की स्थिति ऐसी थी की जैसे उनके प्रशस्त पिछवाड़े पर प्रचुर शक्ति वाला पाद प्रहार पड़ा हो और वे रजास्वादन को विवश हों. उफ्फ!! जाने कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे, गाते गाते लोग चिल्लाने लगे. और वे, वे तो वह किताब ढूंढ रहे हैं जिसमें इस बियाबान से निकलने का कोई रास्ता, कोई नक्शा दिया हो. आहत हैं आडवाणी. इस तरह कोने में पड़ जाना उन्हें जरा नहीं सुहा रहा. सियासी समंदर का ज्वार उतर चुका है, चहुंओर सन्नाटा है, सियासी सफर में सन्नाटा सबसे ज्यादा सालता है. पराजय पहले भी झेली है आडवाणी ने पर इतने पराभूत इतने पशेमां नहीं रहे. आडवाणी की समझ में नहीं आ रहा है कि चहुं ओर उजाला, होप बस उनकी तरफ ही क्यों है घटाटोप? वह भी जईफी के इस दौर में चौरासी बरस का सिन और ये दिन, समय सत्वर सरकता जा रहा है, रीता रीता सा बीता जा रहा है. क्या कुंडली में वाकई प्रधानमंत्री योग नहीं है, क्या उप प्रधानमंत्री पद ही प्रारब्ध की पराकाष्ठा थी? क्या सबसे ज्यादा समय तक नेता विपक्ष बने रहने का किर्तिमानी होने के अलावा कुछ और बड़ा कभी हासिल नहीं होगा. आडवाणी आकंठ सोच में डूबे हैं. जाने कहां से उनके कानों में यह आवाज अब भी बार बार गूंजती है, एक बार जाल डाल रे मछेरे, जाने किस मछली में फंसने की चाह हो. पर पानी कुछ उतरे, झंझावात थमे तो जाल डालें, इधर जीवन का पानी उतार पर है तो उधर पार्टी ने पानी उतार लिया. पानी उतरने में हो सकता है पांच साल लग जाएं. यह अंतिम मौका था, यदि इसे अंतिम से पहले का मौका मान भी लें तो क्या पता अंतिम मौके की परिणिति भी ऐसी ही हो. फिर तो कोई मौका बाकी न रहेगा. रणछोड़ बनना भी ठीक नहीं, तो क्या मैदान में फिर लौट चलें. क्या उनके सफल सियासी सूत्र जिनसे तमाम समीकरण हल किए हैं अब समीचीन, सटीक और सार्थक नहीं रह गए. फिर आखिर इस पराभव, परिस्थिति से पार पाने के पैंतरे आखिर क्या हो सकते हैं.यह प्रस्तरी प्रश्न, प्रतिक्षण, प्रमुदित, प्रहर्षित, प्रगल्भ और प्रवाहमय रहने वाले आडवाणी के आगे है. बीते दिन की याद सताती है जब चुनाव से बहुत पहले ही पार्टी ने प्रचारित कर दिया था कि यदि पार्टी पराजित नहीं हुई तो परिणाम पश्चात पार्टी प्रमुख रहे आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद गहेंगे. प्रत्याशा में लगे पार्टीगत प्रतिस्पर्धियों, परोक्ष प्रतिद्वंदियों को अब और प्रयासरत रहने, प्रपंची पराक्रम दिखाने या परेशान होने की आवशयकता नहीं. इस अनुदेशी आह्वान के बाद आडवाणी एक बार फिर सुर्खियों के सबब बन बैठे थे. तब आडवाणी ने मोदी की प्रखर होती महात्वाकांक्षा के महत्व को नकार कर और इसे मीडियागढंत माना, इस मामले में दिए गए मनमोहनी बयान को नौसिखिया नातजुर्बेकार के बोल बताए लेकिन इस बात में बजन कम न था कि अटल की अस्वस्थता और मोदी का बढता महत्व ही उनके आरोहण का आधार बना पार्टी जानती थी कि मोदी मुदित हुए (जीते) तो आडवाणी आखेट की आशंक है अत: आड्वाणी का औचक आरोहण ही इस आशंका का अकसीर इलाज है. केंद्र पर काबिज होने की मोदी महात्वाकांक्षा का रथ मंजिले मकसूद पर न पहुंचे, वह रथ राज्य में ही रुका रहे इसके लिए आकाओं ने महारथी आडवाणी का रथ उनके रास्ते में अडाय़ा था. पर यह दांव न पार्टी के कम आया न आडवाणी के. खैर, नेता विपक्ष पद पाने के लिए पार्टी में फिर जोड़ जुगत न शुरू हो जाए उठापटक न मचे इसलिए एक बार फिर जाते हुए आडवाणी का आह्वान पार्टी ने किया. मान मनौव्वल से मान जाने की पुरानी आदत होने के नाते वे मान भी गए. पर इतने भर से क्या होता है, अब तो वह भी नहीं. सियासी चौसर के चौकन्ने चैंपियन की चाहत तो हमेशा से प्रधानमंत्री पद की रही है. छाया प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, पर प्रधानमंत्री?? पूरे देश में कमल खिलाने, देश को कीचड़्मय बनाने की आडवाणी आकांक्षा लगता है अब काठ की हांडी हो चुकी है. सांगठनिक सूत्रों के सघन संजाल पर सतत सतर्क दृष्टि रखने वाले आडवाणी तोगड़िया, सिंघल ठाकरे या साध्वी सरीखे अनर्गल अनृत्य आख्यानों के आदिगुरू भले न हों पर आलोचकों के अनुसार आगलगाऊ उद्गारों से आडवाणी का आगार भरा पडा है. हांलाकि उनकी जुबान की कमान से निकले बयान इतने संयमित होते हैं कि वे सिर्फ तपिश पैदा करते हैं, राजनैतिक तापमान बढाते हैं, लोगों को तपाते हैं, तप्त करते हैं, कुछ को कुछ सुलगाते हैं. अनुशासन और सैद्धांतिक अकड आडवाणी के सिद्ध सियासी सूत्र हैं. उनका हार्डॅलाइनर हिंदुत्ववादी, राष्ट्रवादी सिद्धांत भले ही मोदी सरीखा हाहाकारी न हो पर हमलावर शैली का जरूर दिखता है. संघ के वरिष्ठ आडवाणी और अटल को पार्टी का जुड़वा बैल मानते आए हैं, वे इन्हें अलग अलग क्या मानते हैं यह तो पता नहीं, फिलहाल आडवाणी अकेले पड़ गए हैं और पार्टी की गाड़ी खींचने से भी दरकिनार हैं. बैठे बैठे पगुराने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है. दल में आडवाणी को जो मान और कमान हासिल थी वह किसी को नहीं थी पर अब कहां की कमान और बिन कमान कैसा तो मान. आडवाणी ने भी दल के मूल को कभी नहीं तजा, शाखाओं प्रशाखाओं पर विचरते हुए आडवाणी शीर्ष पर अवस्थित हुए तो यह उनकी निष्ठा , निष्णातता, निपुणता दर्शाता है. दूसरे नेताओं की तरह समय देख कर काटने- चाटने वाला मीडियाई रिश्ता वे नहीं रखते. मीडिया को मैनेज करने, मैनेज किए रहने में वे माहिर माने जाते रहे हैं. जोशी, अटल और संघ से आडवाणी के छत्तीसी आंकड़ों,दरकन दरारों की खबरें खबरची खूब देते रहे पर आडवाणी के संग-साथ, सांठ-गांठ पर कभी असर न डाल पाए. निस्संदेह वर्तमान व्यथित कर देने वाला है. लेकिन भाषा भूषा और भाषण के आभूषणों से आच्छादित आडवाणी का भवितव्य बीते दिनों से ज्यादा भव्य और भला नहीं हो सकता कैसे कहा जा सकता है. सियासी सितारे कभी बुलंद नहीं होंगे, कहा नहीं जा सकता. आडवाणी के पास समय कम है फिर भी किसी भी अवसर पर आक्रांत नजर न आने वाले आडवाणी ने आगत के प्रति आश्वस्त रहने का मन बना लिया है.