राहुल गांधी जैसा नातजुर्बेकार नेता तो क्या कोई सामान्य व्यक्ति भी जो किसी खास राजनैतिक विचारधारा का बंधुआ या नितांत मूर्ख (दोनो पर्याय ही हैं) न हों अथवा धार्मिक कट्टरता के चलते बंद दिमाग न हों तो वह भी इसे सहजता से स्वीकारेगा कि किसी देश, परिवार,समाज को बाहर से ज्यादा खतरा भीतर से होता है. हमले और भीतरघात में यही तो फर्क है.घर के चिराग से लगी आग कुछ अधिक दुर्भाग्यपूर्ण है,घरवालों से बेखबर घर के ही कुछ लोग घर में बैठ कर कर घर के लोगों के ही खिलाफ षडयंत्र रच रहे हों, इस साजिश से ज्यादा खतरनाक साजिश और क्या हो सकती है, बेटे ही मां के प्रति दुराचरण करे तो इससे ज्यादा घृणास्पद क्या हो सकता है, जब देश समाज के अभिभावक, रहनुमा ही बलात्कार से इसलिए समझौता करने और उसे छुपाने को कहें कि पडोसी क्या कहेगा,तो इससे अफसोसनाक और क्या हो सकता है? जब राष्ट्रधर्म का अलम उठाने का दावा करने वाले ही सियासती मजबूरियों के चलते राजद्रोहियों की खुले आम वकालत करें तो देश के लिए इससे घातक स्थिति क्या हो सकती है.? यह सभी जानते हैं कि कॉंग्रेस हो या भाजपा अथवा वाम वे इतने मूढ नहीं हैं,कि इस खतरे को न जानते हों लेकिन सियासत के हाथों सभी मजबूर हैं.राजनीति अपनी कीमत वसूलती है. सभी की शर्म छेन लेती है,किसी की रीढ खींच लेती है किसी का दिमाग, तो किसी को निर्वीर्य कर देती है.कांग्रेसी हिंदू वोट न नाराज हो जाए इस डर से इसे स्वीकारने में डर रहे हैं तो भाजपाई इस डर से कि उनके ही बाप दादा, परिवारी जन इसमें कही न कही फंसे हुए है इस लिए इसे नकार रही है. धर्मनिरपेक्षिता का झंडा धोनेवाले वामपंथी भी इस पचडे में कोई राजनैतिक लाभ न देख कर निर्वीर्य चुप्पी साधे हुए हैं


यह बात कोई भी पूरी दिलेरी से क्यों नहीं स्वीकारता कि ,हां देश के लिए ही देश में पनपने वाला भगवा आतंक अगर अभी पूरी निर्ममता से नेस्तोनाबूद नहीं किया गया तो किसी मायने में यह इस्लामी आतंक से भी घातक सिद्ध होगा. अगर आप सच्चे भारतीय हैं, सम्यक और निरपेक्ष बुद्धि रखते हैं, आपका दिमाग किसी दल के पास गिरवी नहीं है तो यह मानने में क्या बुराई है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भटके, धर्मच्युत और कमअक्ल कट्टरपंथी मुसलमानों की तरह ही एक बेहद छोटा सा तबका देशी कट्टरपंथी ब्राह्मणवादियों का भी है जिनकी निम्नस्तरीय आतंकी कारगुजारियां निस्संदेह इस्लामी आतंकी गुटों जितनी सघन नहीं हैं लेकिन वे इस रास्ते पर हैं इसके सुराग तो मिलते ही हैं. इनका यह मूर्खतापूर्ण प्रयास राजद्रोह,धर्म विरुद्ध आचरण और मानवता के प्रति जघन्य अपराध है. इनका पक्षधर होना देशद्रोह.
यह रोग अभी शैशवावस्था में है,यदि सियासी फायदे के लिए इससे आंखें मूदी गईं,जानबूझ कर इसे नकारा गया तो इसकी कीमत आने वाली कई पीढियों को चुकानी पडेंगी. खैर, पांच साल से ज्यादा की चिंता न करने वाली सियासी पार्टियों को पीढियों की चिंता क्यों हो भला, पर क्या आपको है? अगर आप भी किसी राजनैतिक विचारधारा के गुलाम हैं तो चिंता करने की कोई जरूरत नहीं क्यों की गुलामों की चिंता से कभी कुछ नहीं होता. अगर अपने को स्वतंत्रचेता समझते हैं तो कुछ सोचें, करें,विचार व्यक्त करें.