दो दशक पहले की बात है, हमारी रेलवे कॉलोनी से सटे मुहल्ले से एक युवक पान मसाला मुंह में दाबे कालोनी में मंडराया करता था,बोर्ड परीक्षाओं से निकलते निकलते जवान हो चुका था. तमाम कोशिशों और बेतरह नकल के बाद वह बीए पास हो पाया, इसके बाद उसने कानपुर के उस समय नकल के लिए कुख्यात और बिना पढे पास होने वालों का स्वर्ग माने जाने वाले विधि विद्यालय में दाखिला लिया. जाहिर है अनुभवी था, पास हो गया. वकील बना, नहीं चला, पिछली बार सुना कि काफी मशक्कत की,कहीं जज हो गया. मैंने खुशी और अचरज जाहिर की तो दोस्त बोले अरे, इसमें क्या है ज्यादातर असफल वकील जज बन जाते हैं.
अभी हाल तक छोटे बडे शहरों कस्बों तक में ज्यादातर वे विद्यार्थी जो विज्ञान, वाणिज्य वर्ग में बेहतर नहीं कर सकते थे वे कला संकाय का आसरा लेते थे और जो पढाई में बेहद फिसड्डी होते थे जिनेके बुद्धि का इंजिन अध्ययन की गाडी और आगे नहीं खींच सकता था उनके लिए एलएलबी ही सबसे श्रेष्ट विकल्प था. पता नहीं क्यों पर ऐसा था. हालांकि कुछ बहुत अच्छे छात्र अपनी मर्जी और शौक से कानून की पढाई चुनते थे पर बेहद कम.
ये जैसे तैसे पढाई पूरी करते, रजिस्ट्र्शन लेते,काला कोट धारे 50 -100 के आसामी ढूंढते फिरते और कहीं से लंबा हाथ मारने की फिराक में लगे रहते. अद्यतन सूचनाओं, विधिक क्षेत्र के विकास और दूसरी जानकारियों के प्रति अरुचि,सामाजिक सरोकारों से बस इतना लेना देना कि किसी का काम थाना ,पुलिस अदालत में अटस्के तो उसे ग्राहक के भाव से देखना.
यह सब मुझे तब याद नहीं आया था जब सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठतम वकील अल्तुतमिश कबीर ने कहा था कि न्यायपालिका में 80 फीसद ईमानदार हैं और न तब जब पूर्व मुख्य न्यायधीश एस पी भरूचा ने कहा कि अदलतो में 20 प्रतिशत भ्र्ष्ट लोग हैं,यह बात तब भी नहीं कौंधी थी जब पी एफ घोटाले में दो जज आरोपित हुए या सौमित्र सेन तथा पी डी दिनाकरण पर महाभियोग लंबित होने की बातें सुनता रहा और न ही निर्मल यादव के कैश एट डोर वाले मसले पर, लेकिन जब अभी पिछले दिनों यह छोटी सी खबर पढी कि एक जज महोदय अपनी शादी में इतने टुन्न होकर पहुंचे कि फेरे से पहले ही होने वाली बीबी ने उनसे तौबा कर ली और उनके द्वारा भावी ससुर को गाली देने के बाद लडकी ने शादी से ही इनकार कर दिया,ऐसे में कुछ दिन पहले घटी वह घटना याद आ गई जिसमें जज ने अपने साथी जज की बीबी के साथ छेड छाड की थी और मारपीट भी, मुझे वह परिचित भी याद आ गए जो दिल्ली में रहते हैं और अपने वकील भाई की फरमाइशें यदा कदा पूरी करते रहते हैं जो उसकी न होकर उस जज की होती हैं जिनकी अदालत से वे जुडे हैं.
खैर, किस्सा कोताह, न्यायमूर्ति काटजू और उनका परिवार सौ साल से इलाहाबाद हाई कोर्ट को जानता है वे कुछ भी कह सकते हैं,मेरे पास न तो न्यायधीशों के आचरण या उनके अंकल सिंड्रोम पर टिप्पणी करने का कोई हक है न मंशा. वैसे भी कुछ कहना ब्लॉसफेमी की तरह है ऐसे में मैं न्यायमूर्ति काटजू की इस बात को भी नहीं दुहराना चाहता कि समथिंग इस रॉटिंग पर अपने छोटे से अनुभव से यह जानता हूं कि हमारे ज्यादातर माननीय कहां से आते हैं. और जानने का मतलब तो न्यायालय की अवमानना नहीं हो सकता.