आइए, नए साल में हम और आप संकल्प लें कि अपने सामाजिक दायित्व के तहत इस बार वैचारिक बंधुआ लोगों की मुक्ति का प्रयास करेंगे. बंधुआ वैचरिकता, कैप्टिव आइडियोलॉजी, यह दासता बंधुआ मजदूरी से भी बडा कलंक है और उससे कहीं ज्यादा घातक. शरीर की गुलामी, आदमी की अपनी सोची इच्छा, आकांक्षा पर किंचित नियंत्रण से कहीं बडी बात है उसकी सोच को ही कब्जा लिया जाए. निस्संदेह इसकी सांकलें ढीली करना नामुमकिन सा लगता है, लेकिन शुरुआत तो किसी ना किसी को कहीं से करनी ही होगी, क्यों न हम आप ही यह करें, और इसी साल से.
वैचारिक बंधुआपन या मानसिक दासता ही तमाम युद्धों, हिंसा, असहिष्णुता, असमानता, जडता, मूढता से लेकर अकर्मण्य,जनविरोधी कुप्रशासन वाली सरकारें प्रसूत कर्ने क कारण है वह इस जैसी बहुतेरी बुराइयों की जड है. वाम या दक्षिण, संघी अथवा लीगी का पट्टा गले में डाल कर इतराने वाले लोगों को उनके पालतूपन के भ्रामक गर्व की असलीयत का भान विनम्रतापूर्वक कराना होगा.मानसिक रुग्णता में बहुधा रोगी की कोई गलती नहीं होती,वह ठीक हो सकता है बशर्ते वह यह मान ले कि उसे कोई मानसिक परेशानी है. अधिकांश मामले में वह नहीं मानता,जोर जबरदस्ती से रोग बिगड सकता है, उसकी मान्यता कट्टरता में बदल सकती है .रोगी इस जटिल स्थिति में न पहुंचे इसके लिए हमें सावधानी,सहानुभूति और सच्ची विनम्रता और धैर्य का परिचय देना होगा. बस एक बार उन्हें इस बात का अहसास हो जाए कि वैचारिक आजादी क्या होती है, विचार विपिन में, भांति भांति के विचार विटपों के बीच निर्द्वंद, निर्भय, निरपेक्ष, चरने-विचरने में, इस आजादाना मस्त गश्त में जो बनारसी मजा है,वह कितना आत्मगौरवपूर्ण,कितना संतुष्टिकारक है वह किसी के फेंके गए वैचारिक रोटी के टुकडों पर पलने,गुलाम मानसिकता में जीते रहने में कहां.उसके बाद तो बस उन्हें ठीक हुआ ही समझिए.
राजनैतिक विचारधाराओं के अपने निहितार्थ, स्वार्थ, मजबूरियां हैं, उनकी अपनी सीमित सीमाएं हैं, उनका अपना लक्ष्य, अपना दर्शन, अपना धर्म है.( यहां सुअर खाने,शराब और चुरुट पीने वाले जिन्ना मुसलमानों के राजनैतिक- धार्मिक नेता ही नहीं कायदे आजम बन सकते हैं) यहां सिद्धांत और चरित्र कम, व्यावहारिकता ज्यादा होती है. वर्तमान में तो सिद्धांत सिर्फ मुलम्मा है, महज व्यावहारिकता ही अब शेष है, वह भी नितांत नकारात्मक रूप में. ऐसे में कोई अगर पेशेवर तौर पर तत्संबंधी धारा से जुडा है, लाभान्वित हो रहा है, पेट पाल रहा है तो वह आजाद नहीं, खास तरह की वैचारिक दलाली के लिए मजबूर है. परंतु ढेरों ऐसे लोग भी हैं जिन्हें किसी से कुछ लेना देना नहीं, महज जाति, धर्म, क्षेत्र आदि से भावनात्मक जुडाव या फिर दिशा के अभाव अथवा पारंपरिक वैचारिक गुलामी की रस्म निभाते हुए वे किसी खास धारा के पिछ्लग्गू ही नहीं बने रहते, बडी कट्टरतापूर्वक उस विचारधारा, पंथ या पक्ष की वे अवैतनिक दलाली करते हैं. उसकी जिसके प्रवर्तक, उनके मालिक इन्हें जानते पहचानते तक नहीं, इस तरह झंडा ढोने वाले अगर दल में शामिल भी हो जाएं तो उसमें इनकी स्थिति दासानुदास की, टहलुए की सी होगी.
हमें ऐसे लोगों को समझाना होगा कि उनका मस्तिष्क सैकडों हजारों चैनल पकडने, ग्रहण करने के लिए बना है. वह दूसरों के दिमाग की तरह ही पूर्णतः सक्षम है, लेकिन आप तो किसी रेलवे स्टेशन या एयरपोर्ट पर लगे टीवी सेट की तरह चौबीसों घंटे, बारहो महीने बस हरा, लाल, केसरिया, भगवाई, जैसे किसी एक चैनल पर बजने के लिए किसी के द्वारा ट्यून हैं, खुशी खुशी मजबूर हैं. यह आपके असीमित मस्तिष्क की तौहीन है. इस पिछ्लग्गूपन से पीछा छुडाना होगा. मनुष्य के रूप में अपनी क्षमताओं को पहचानना होगा, तुच्छ्ता से निजात पानी होगी.

मानसिक आजादी, स्वतंत्र सोच और उससे उपजे विवेक के चलते ही मनुष्य अशरफुल मखलूकात यानी प्रणियों में सर्वश्रेष्ठ है, अन्यथा भेड्चाल वाले पशुओं और उसमें क्या भेद. अगर जीवन में कुछ श्रेष्ठ करना है तो वैचारिक आजादी जरूरी है, बुद्ध के अनुयायी बन कर बुद्ध कोई नहीं बन सका, कई बुद्धू भी बने हों, नहीं कह सकते. तमाम जैनियों ने वस्त्र त्यागे लेकिन महावीर कहां बन पाया कोई. जहिर है लीक छोडनी होगी.’अप्प दीपो भव’,’अहम ब्रह्मास्मि’ ‘अनलहक’ का कोई तो अर्थ होगा. बहुत बडी महत्वाकाक्षा ना भी हो केवल बेहतर जीवन जीने के लिए,जीवन का सर्वपक्षीय रस लेने के लिए वैचारिक दासता से मुक्ति पहली शर्त है, किसी भी प्रकार का पूर्वग्रह, कटुता, कट्टरता का निषेध जिससे सहज, सम्यक, सर्वग्राह्य, नीर-क्षीर बुद्धि - विवेक का विकास संभव हो सके, और इस विवेक के आलोक में हम सब कुछ साफ साफ देख सकें, इस स्पष्ट्ता का आनंद ले सकें.
तो फिर इस साल हमारी कोशिश रहेगी कि हम कुछ लोगों को वैचारिक बंधुआगीरी से मुक्ति दिला सकें. उनकी बुद्धि को लाल, हरा, भगवाई, हिंदुत्व, इस्लामी धब्बों से मुक्त कर निर्मल कर सकें तथा उन्हें एक बेहतर सुंदर, समरस, सहिष्णु, सार्थक, सफल, सकारात्मक, सामाजिक जीवन की ओर उन्मुख कर सकें. एक मनुष्य की तरह विचारने पर उन्हें सहमत कर सकें. मुझे पता है कि हम और आप ही मिल कर यह कर सकते हैं. तो फिर आइए संकल्प लें.
नया साल संकल्पों की सफलता का साल हो.
आमीन