भगवाई आतंकी भला करकरे को क्यों मारेंगे? मुंबई पुलिस ने सारी मीडिया को बताया है और सभी जानते हैं करकरे को पाकिस्तान से आए आतंकियों ने मारा, भगवाई आतंकी दस बारह बड़े बम विस्फोट साजिशों में शामिल हो सकते हैं, राष्ट्र हित में 70 -75 चुनिंदा लोगों की हत्या की योजना बना सकते हैं (संदर्भ - अभिनव भारत के प्रसाद पुरोहित की 26 जनवरी 2008 की बैठक का भाषण, पुलिस की जांच रिपोर्ट में है). इक्के-दुक्के को मारने का टुच्चा काम क्यों करेगी. अंतुले तो मुसलमान और अल्पसंख्यक विभाग के मंत्री रहे, वे तो ऐसा कहेंगे ही दिग्विजय सिंह का तो कहना ही क्या बटला हाउस से मिर्जापुर तक वे तो भगवाइयों के पीछे ही पड़े रहते हैं, यहां तक कि अपने पार्टी लाइन और देश की सुरक्षा तथा कूट्नीति को भी ताक पर रख कर अब ऐसे सिरफिरेपन को क्या कहें! भले दर्जन भर मामले और कई गिरफ्तारियां हो चुकीं हों लेकिन अभी यह पूर्ण स्थापित तथ्य तो नहीं है कि देश में भगवा आतंक सक्रिय है. करकरे अपूर्ण तथ्य की जांच में कथित तौर पर ऐसे मुकाम पर थे कि भगवाइयों के राष्ट्रद्रोह का सारा कच्चा चिट्ठा सामने आ जाता और तमाम चेहरे बेनकाब ही नहीं होते बल्कि नेपाल से लेकर इजरायल और चेकोस्लोवाकिया तक की कुलाबें भरने वालों की हवा निकल जाती.
यह सब आशंकाएं और अटकलें हैं देश की व्यवस्था पर काबिज भगवाई समर्थक इतने कमअक्ल नहीं कि इन अटकलों को सही साबित होने देंगे. अब इस तरह की अटकलों की बुनियाद पर इतना बड़ा आरोप, वह भी राष्टृवादी भगवाइयों पर यह सोचना ही जघन्य है.
कुछ लोग हैं जो मीडिया, मुंबई पुलिस, देश की व्यवस्था में आस्था ही नहीं रखते. देश में भाजपा भी एक पार्टी है, इससे कुछ सीख लेनी चाहिए. वह क्या कभी कोई तार्किक बात करती है? नहीं. हमेशा आस्था की बात करती है, लेकिन बात डंके की चोट पर करती है. बहुतों को सही भी लगती हैं. अब आप ही बताएं कि इन कथित तर्कशीलों और भगवा विरोधियों के इन बेहूदा सवालों का कोई क्या जवाब दे.
1. क्या ताज, ओबेराय और सीएसटी तथा कॉमा अस्पताल पर हमला करने वाले सभी आतंकी पाकिस्तानी थे? फिर सीएसटी वाले धारा प्रवाह मराठी कैसे बोल रहे थे? और उन्होंने टोपीधारी मुसलमानों को जम कर निशाना क्यों बनाया (यहां मरने वालों में से 46 में 22 मुसलमान थे)?
2. के.पी रघुवंशी ने करकरे को बताया कि दो आतंकी पैदल ओवरब्रिज पार कर गए हैं जबकि ऐसा था नहीं. खुद रघुवंशी भी तत्काल उधर नहीं बढ़े. इस तरह की बातचीत तथा दूसरे कई और सबूतों की जांच क्यों नहीं होती जिससे साबित होता है कि करकरे को जानीबूझी साजिश के तहत एक खास स्थल तक पहुंचाया गया?
3. किताब ‘लास्ट बुलेट’ में श्रीमती कामटे ने लिखा है कि आतंकी रंग भवन लेन (जहां करकरे मारे गए) पर 10 से 15 मिनट से इंतजार कर रहे थे. आखिर किसका, इतना समय उनके पास कैसे था?
4. इस कहानी को सिरे से नकरने का काम क्यों नहीं होता कि, आईबी में बैठे कुछ भगवा भक्तों ने अमेरिका और ‘रॉ’ के जरिए एडवांस में मिली इस सूचना को कि पाक आतंकी समुद्र के रास्ते मुंबई पर हमला करने आ रहे हैं, हेमंत करकरे को निबटाने में इस्तेमाल किया. उन्होंने पश्चिमी नौसेना या मुंबई पुलिस को सूचना देने की बजाए अपने लोंगों तक यह बात पहुंचाई. इन लोगों ने आठ प्रशिक्षित भगवाई भक्तों को चुन उन्हें सतारा के सिमकार्ड दे कर दो-दो के समूह में मुंबई के कॉमा अस्पताल, सीएसटी और एसबी ऑफिस पर यह कह कर तैनात किया कि ताज और ओबेराय पर आतंकियों के पहुंचने का इशारा मिलते ही ऑपरेशन शुरू कर देना है. दो को रिजर्व में रखा.
5. ऑपरेशन के बाद वे यह इलाका छोड़ देते और आई बी अपने स्टॉक से दो आतंकी निकाल कर एक को मार कर तथा दूसरे को घायल छोड़ कर सारी कहानी स्थापित कर देती.
6. हालांकि योजना से अनभिज्ञ गिरगांव चौपाटी पर तैनात पुलिस वालों ने दोनों प्रायोजित आतंकियों को मार डाला. ऐसे में आईबी को अपने स्टाक से एक और आतंकी निकालना पडा.
कहानी बहुत लंबी है. पेचीदगी से भरी रोचक और तमाम झूठी-सच्ची लगती बातों से भरी, मीडिया की विरोधाभासी खबरों से काफी अलग लेकिन संक्षेप में यह कि कुल मिला कर यह कहानी साबित करना चाहती है कि सीएसटी, रंग भवन लेन और कॉमा अस्पताल पर हमला पाकिस्तानी आतंकियों की बजाए भगवाई आतंकियों ने किया और उनका मकसद था करकरे को घेर कर एक खास जगह पहुंचाना और पाकिस्तानी हमले की आड़ में करकरे को निबटा देना और वे अपने काम में सफल रहे.
करकरे को किसने मारा इस मसले को बार उठाने और निर्दोष शांतिकामी भगवाइयों पर लांछन लगाने तथा हर बार किचकिच करने से बेहतर हो कि इस कहानी पर भी एक बार जम कर काम हो. सारे सबूतों को निरस्त कर, नान्देड़ से मालेगांव तक के सारे कलंक धो दिए जाएं.
अब आप कहेंगे इस लाइन पर जांच से पाकिस्तान को लाभ होगा वह क्या कहेंगे, देखिए यह आंकडों से ही नहीं सत्यापित तथ्य है कि बलात्कार के महज कुछ प्रतिशत मामलों में ही बाहरी अपराधी शामिल होते हैं ज्यादातर ऐसे मामले परिचित,पारिवरिक लोग, रिश्तेदार शामिल रहते हैं, और ऐसे ज्यादातर मामले इसीलिए दबा दिए जाते हैं कि बात खुलेगी तो पडोसी क्या कहेंगे. अब इसका क्या मतलब महज इसीलिए कि पडोसी क्या कहेंगे हमें बलात्कार या बलात्कार का झूठा आरोप बर्दाश्त कर लेना चाहिए?
यह सब कॉंग्रेसियों की साजिश है. वे इस कहानी को एकबारगी खत्म करना नहीं चाहते. ऐसा कर वे अपने ही हाथों बार-बार राष्ट्रभक्तों की नीयत पर सवाल उठाने का मौका हमेशा के लिए क्यों खत्म होने देंगे?