देश में स्वर्णकाल आने ही वाला है. ‘गरल सुधा रिपु करहिं मिताई’ वाला सीन साफ दिखने लगा है. अपने शासन के दौरान कदाचार, भ्रष्टाचार के कीर्तिमान बनाने - बनवाने वाली कॉंग्रेस तथा बंगारुओं और येदुयरप्पाओं से सुशोभित भाजपा, दोनों अपने-अपने स्तर पर देश में फैले भ्रष्टाचार के खिलाफ, उसे दूर करने के लिए अलख जगाने पर आमादा हैं. ऐसा सुअवसर देश में केवल युद्ध और राष्ट्रीय आपदा के समय ही दिखता है. आज जबकि न युद्ध है न राष्ट्रीय आपदा, तब इस तरह देश हित में पक्ष-विपक्ष का एक ही दिशा में सक्रिय होना वाकई इस बात का एहसास दिलाता है कि या तो स्वर्णकाल करीब है, या कोई बहुत बड़ी गड़बड़ है.
रोगी ही रोग से लड़ने की ठान ले तो रोग की खैर नहीं (फिलवक्त तो रोगी रोगी से लड़ रहा है, खुदा खैर करे!). अब अगर देश के दोनो राजनैतिक दलों की शुभेच्छा पूरी हो गई, अव्वल तो ऐसा होगा नहीं. भले मानुसों की सदइच्छाएं तो पूरी हो नही पा रहीं, इनकी क्या होंगी. फिर भी मान लें ऐसा हो भी गया; देश भ्रष्टाचार से मुक्त हो गया तो क्या होगा? भ्रष्टाचार और राजनीति में अन्योन्याश्रित संबंध है. बिना भ्रष्टाचार के राजनीति जनता के लिए सुपाच्य होगी ऐसी कल्पना की जा सकती है. लेकिन राजनेताओं के लिए तो यह डबल टोंड, सेपेरेटा दूध से भी ज्यादा बदमज़ा हो जाएगी. खैर, उनके लिए जो भी हो पर हमें तो आम जनता और देशहित से मतलब है. भ्रष्टाचार निर्मूलन आम जनता को कतई रास नहीं आने वाला है, न ही यह किसी भी तरह से देशहित में है. खास तौर से वह छोटे और मझोले स्तर का भ्रष्टाचार, जिससे देशवासी का पाला पड़ता रहता है, उसका खात्मा तो घातक है. पार्टी फंड में बंगारुओं का पैसा लेना या राजाओं द्वारा कौड़ियों के मोल स्पेक्ट्रम बेचना नहीं तो चलता ही रहेगा. यह आम जन के लिए कितना नुकसान-देह है, इसका पता मीडिया को ज़्यादा है, आम जन को नहीं. अतः जिसे इसके बारे में पता है वही इसके नफ़े नुकसान सोचे. वैसे भी सरकारी सुधारों से महज सरकार का ही फायदा होता है, आम जन, गरीब-गुरबा के लिए तो ये सुधार अमूमन उनके सिधार जाने का कारण बनता है.

अब आप ही सोचिए, अगर ट्रैफिक पुलिसवाला चौराहे पर दस-पचास ले कर न छोड़ दे और लगातार आड़े-तिरछे ऑटों या रिक्शॉ दौड़ाने वालों का चालान निय्मित तौर पर कटने लगे तो वे बेचारे ऑटो या रिक्शॉ कब चलाएंगे! चालान भरने और अदालत तक जाने के लिए ऑटो करने भर के पैसे भी न कमा पाएंगे बेचारे; खाने-पीने के लाले ही पड़ जाएंगे सो अलग. ऑटो रिक्शॉ वाले की तो छोड़िए उस पुलिस वाले का क्या होगा? काम तो पचास गुना बढ़ जाएगा, आमदनी शत प्रतिशत घट जाएगी. ऐसी निरुत्साहजनक और नकारात्मक परिस्थितियों में भी वह काम करता रहेगा, ऐसी सोच आपकी है तो आप मूर्ख हैं. और अगर वास्तव में वह काम करता ही रहा तो वह मूर्ख कहलाएगा. यह तो एक उदाहरण ह. तमाम बाबू लोग अव्वल तो दफ्तर जाएंगे ही नहीं. जाएंगे भी तो कभी-कभार, या घर से ऊब कर बेमन से. अब जब ऊपरी कमाई की कोई आस नहीं तो दफ्तर जाना न जाना बराबर ही है. उनके कार्य-जीवन की प्रेरणाशक्ति समाप्त हो जाएगी. घूस के पैसों का वह प्रेरणास्पद प्रकाश-पुंज जो उन पर उपकार के पुण्यपथ पर प्रशस्त करता तथा उनके इस मार्ग पर प्रतिक्षण प्रकाश प्रकीर्णित करता रहता, वह अचानक ही लुप्त हो जाएगा. नैराश्य का यह दिग्भ्रमित करने वाला घटाटोप अंधकार न सिर्फ उन्हें कार्य से विमुख करेगा बल्कि देश की उत्पादकता को घटाएगा जिसका सीधा और नकारात्मक असर सकल घरेलू उत्पाद (GDP) पर पड़ेगा. जाहिर है विकास पर भी.
बाबू हो या पुलिसिया अथवा प्रशासनिक अधिकारी, जो भी जनता से सेवाशुल्क लेते हैं वह उसे नेताओं की तरह बहुधा स्विस बैंकों में नहीं रखते बल्कि जमीन जायदाद खरीदने में, मौज मस्ती करने में, ऐशो-इशरत के सामान खरीदने में और कभी-कभी भगवान या बॉस को चढ़ावा चढ़ाने में खर्च करते हैं. कुल मिलाकर वह धन देश की अर्थव्यवस्था में किसी न किसी रूप में बना रहता है. उद्योग-बाजार क्रयशक्ति को बढ़ावा देता हुआ, देश की विकास में सहयोग करता हुआ, देश के काम आता हुआ, सक्रिय रहता है.
आप कहेंगे कि बेहतर होता सारे कार्य वैधानिक तरीके से नियमानुसार होते; तो यह सारा पैसा नियमतः सरकार के राजस्व में जुड़ता, देश के विकास के काम आता, यही देशहित में, जनहित में बेहतर रहता. हो सकता है कि आपकी इस मासूम और भोली सोच में किंचित भरमाने वाली आभासी सच्चाई हो लेकिन इसकी कतई कोई गारंटी नहीं कि यह पैसा जनहित में लगेगा, किसी ढपोरशंखी सरकारी परियोजना या ऊंचे स्तर के राजनैतिक भ्रष्टाचार में नहीं. जबकि घूस का पैसा बाबू, अधिकारी या पुलिसिए की जेब में जाने से देश के विकास की पूरी गारंटी है.
अगर नियम से काम होने लगे तो पद, पैसा, प्रभुत्व, प्रभाव वाले और जिसके पास भरपूर समय होगा जो तमाम साधन सुविधासंपन्न होंगे, जो उस खानदान से होंगे जिनके बाप-दादे बरसों खिंचने वाले मुकदमों का मजा लिया करते थे और यह परंपरा वह किसी न किसी तौर पर अपने पूर्वजों की श्रद्धांजलि स्वरूप आज भी जिंदा रखना चाहते हैं या आज भी यह खूबी उनके खून में आज भी जोर मार रही है वही इस लक्जरी या विलासिता को झेल पाएंगे.
आम साधनहीन लोगों का एक तो बड़ा सहारा छिन जाएगा ऊपर से जटिल नियम न सिर्फ लोगों को उलझा कर बल्कि तोड कर रख देंगे. बाबुओं की अकर्मण्यता को एक अकाट्य वैधानिक प्रश्रय, काम न करने का बहाना मिल जाएगा जबकि लोग अपने जरूरी काम के बारे में, नियमानुकूल कार्य कराने के झमेले की सोच कर भी सिहर उठेंगे. काम-काज कानूनन होने लगे तो बहुत से लोगों के लिए तो सरकारी काम काज करवाने का सारा रस, रहस्य, रोमांच ही खत्म हो जाएगा. सारे काम काज रुक जाएंगे, आत्म हत्याओं की बाढ़ सी आ जाएगी. जिनकी रोजी रोटी ही भ्रष्टाचार है, घूस की कमाई पर जिनका पेट पलता है, उत्कोच जिनका शगल, शौक और सांस है, वे सब कर्जदार किसानों की तरह निराशा में और आगे कोई रास्ता न सूझने की हताशा में खुद को खत्म करने लगेंगे.
सो मेरा तो यही कहना है कि दिखावे की जंग जरूर लड़ें पर देशहित में यह जरूरी है भ्रष्टाचार जारी रहे. कम-अज़-कम निचले और मझोले स्तर पर, ऊंचे स्तर पर जन और देशहित जैसे छोटे मुद्दों का वैसे ही कोई अर्थ नहीं रह जाता.