गर तू बेवफा है, तो मेरा भी यही तौर सही,
तू नहीं और सही, और नहीं और सही.


यह प्यार की पोर्टिबिलिटी है, जो सदियों से चली आ रही है. इसमें दिल तो वही रहता है, दिलवर और दिलरुबा बदलते या बदलती रहती हैं. प्रेम की यह पोर्टिबिलिटी पुराने समय से प्रयोग में आने के बावजूद न तो यह अशिक-ओ-माशूक को रास आता है न ही माअशरे या समाज को यह भाता है.

नेता अपनी अंतरात्मा की आवाज पर बार-बार पार्टी बदल लेते हैं. आत्मा जो होती है सो वहीं बनी रहती है फिर एक बार आवाज देने के लिए, पर पार्टी और पॉलिटिक्स बदल जाती है. यह पॉलिटिकल पोर्टीबिलिटी है. कुछ नासमझ लोग इसे बुरा मानते हैं और इसे दलबदल कहते हैं.

कुछ नेताओं को किसी भी मुद्दे पर यह रटा रटाया बयान देने की आदत है कि, फलां मुद्दे या मसले पर हमारे सारे विकल्प खुले हुए हैं, तो यह पॉलिटिक्स में पॉसिबिलिटी की पोर्टिबिलिटी है, हर तरह की संभावनाओं का स्वागत करने को तत्पर इस सकारात्मक विचारधारा को राजनीति के अज्ञानी अक्सर अवसरवाद करार करते हैं. कहने का सबब यह कि यह पोर्टिबिलिटी भी अच्छी नजर से नहीं देखी जाती. पोर्टिबिलिटी सुविधाजनक तो है पर प्रशंसनीय कभी नहीं रही.

प्रेम और पॉलिटिक्स की पोर्टिबिलिटी के अलावा कुछ पर्सनल टाइप की भी पोर्टिबिलिटी होती है, कई पुरुष तो कुछ महिलाएं भी अपने पार्टनर के मामले में पोर्टिबिलिटी का प्रयोग करती हैं. सीमित सुविधाओं और विकल्पों वाली इस पोर्टिबिलिटी का यह प्रयोग भी आमतौर पर पसंद नहीं किया जाता, खासतौर पर उनके द्वारा, जिन्हें ऐसे प्रयोग के अवसर नहीं मिले.

सो प्रेम हो, पॉलिटिक्स हो या नितांत पर्सनल मामला, पोर्टिबिलिटी का चलन प्राचीन काल से चला आ रहा है.. तब से जब न तो इतने नंबरों की भरमार थी न ही इतने नंबरी लोग हुआ करते थे. बस नाम ही काफी था. यह पद, पैसा, प्रतिष्ठा, प्रभुत्व, में जैसे जैसे बदलाव आता था उसके अनुरूप स्वतः ही पोर्टिबिलिटी को प्राप्त हो जाता था. पैसा आते ही कल्लू से कलुआ, चुनाव जीतते ही काली राम, मंत्री बनते ही कालूराम से श्रीमान कालीराम जी तक की पोर्टिबिलिटी जिसमें कल्लू कॉमन बना रहता था कहीं न कहीं. लोगों का क्या है वे इस तरह की प्रसिद्धि से हासिल इस प्रशंसात्मक पोर्टिबिलिटी से भी जलते और इस पोर्टिबिलिटी की भी हंसी उडाते थे.

नाम की पोर्टिबिलिटी के लिए कई बार लोग खुद भी प्रयास करते. और मुंह की खाते, अपनी और इस प्रकार की पोर्टिबिलिटी की भद्द पिटवाते. आपको छेदा की वह कहानी याद होगी, बडी कॉमन बोध कथा है, वही छेदा जो अपने नाम को क्षुद्र समझ कर, छिद्रांवेषियों से तंग आकर उसे बदलवाने पादरी साहब के पास गया. पादरी ने उसे धर्म बदलने का फार्म भरवाया और १९ रूपए की फीस लेकर नाम धर दिया मिस्टर होल, पर गरीब छेदा पर मिस्टर होल जैसा नाम कुछ जंचा नहीं और वह एक बार फिर हंसी का पात्र बन गया, लोग अंगूठे और उंगली से खास मुद्रा बना कर उसे बुलाते तो उसे अश्लील और अभद्र लगता. उसने इस बार मौलवी साहब की पनाह ली. मौलवी साहब ने भी नए धर्म में पंजीकृत करवा कर छेदा या कहें मिस्टर होल का नाम सूराख अली रख दिया.

सूराख अली को भी लोग बिगाड कर सुराखे, सुराखी पुकारने लगे तो छेदा गुरुद्वारे गया और बोला मेरा नाम बदल दें. मैं छेदा से होल और होल से सूराख बन पर परेशान हो चुका हूं. संत सरदार साहब बोले,ज्ज् हां तो फीस निकालो,१९ रूपए और फार्म भर दो. कल आकर अपना सार्टीफिकेट ले जाना पर तुम चाहो तो अभी से अपना नाम गड्ढा सिंह पुकार सकते हो.

छेदा ने सिर पीट लिया यह तो और बडा सूराख या कहें छेद था जो होल से ज्यादा अनाकर्षक ध्वनित होता था. सो मॉरल ऑफ द स्टोरी यह कि, दुकान या नाम बदलने से परेशानी भी दूर हो जाएगी तो यह आपका कोरा भरम है, परेशानी अपनी पोर्ट पर हमेशा बनी ही रहेगी.

मोबाइल नंबर पोर्टिबिलिटी का भी यही हाल है, लाख ऑपरेटर, सर्विस प्रोवाइडर बदल लें, आप बमुश्किल छेदा से गड्ढा सिंह का तक का सफर ही पूरा कर सकेंगें. टैरिफ और टॉक टाइम के टीमटाम तथा लुभावने ऑफर एवं कॉलदरों के मायाजाल में फंस कर, बडी कंपनियों की सेवा सुविधाओं के मोहपाश में हे मोबाइल धारी तू आखिर किस किस के पास भटकता रहेगा, पूर्णता को प्राप्त हो ऐसा कोई नहीं है...किसी का स्पेक्ट्रम तंग है तो किसी का इंफ्रास्ट्रक्चर ढीला यह जो पोर्टिबिलिटी है, माया है, एक छलावा है. यह परेशानियों की पोर्टिबिलिटी है. परेशानियां वहीं बनी रहेंगी बस परेशानियां प्रदान करने वाले ऑपरेटर, प्रोवाइडर बदल जाएंगे. परेशानी सत्य, पोर्टिबिलिटी मिथ्या है बच्चा.

आखिरकार आईना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं