'अनपढ आदमी गाड़ी में रखा माल चुरा सकता है, पढा लिखा आदमी पूरी गाड़ी ''.

किसने कहा, छोड़िए उसके नाम में क्या रखा है. जिनके पास ‘नाम’ बहुत था,  ‘दाम’ कुछ नहीं वे किसी ‘काम’ के नहीं रह गए. सो आप नाम को छोडिए नई किस्म की पढाई के नए स्कूल की यह मुनादी सुनिए...

खुल गई ...खुल गई...खुल गई, एशिया में पॉलिटिक्स की पहली पाठशाला खुल गई. जहां गड़ी है लोकतंत्र की किल्ली यानी राजधानी दिल्ली, वहीं खुली है यह शाला. यहां के दिलशाद गार्डेन में इसके अध्येता पढ़ेंगे राजनीति, बनेंगे नेता, कोर्स है यह आला, इस पढ़ाई का किसी से नहीं कोई मुकाबला, पॉवर पैसा, प्रभुत्व सब कुछ इंस्टेंट देने वाला. खुल जाएगा कैरियर और किस्मत का ताला. 

आपके जेहन में मासूम सा यह सवाल आ सकता है कि नेता बनने के लिए पढ़ने-लिखने की क्या जरूरत? बिन पढ़े भी तो लोग न सिर्फ नेता बन जाते हैं, सफल भी रहते हैं, पढ़े लिखे नेता भी जब देश की बजाए पुर्तगाल का भाषण पढ़ आते है तो फिर बिन पढ़ा और पढ़ा नेता सब बराबर ही तो हैं.. आप निरे गावदी हैं. भई, आज से तीन चार दशक पहले पत्रकारिता में डिग्री, डिप्लोमा नहीं के बराबर होता था. पत्रकारिता का स्तर भी वक्त के मुताबिक ठीक ठाक ही था, आज इस तरफ शायद ही कोई बिना डिग्री लिए आए, पर पत्रकारिता का स्तर असाधारण तौर पर सुधर गया हो ऐसा भी नही. डिग्री लेकर चैनल पर भूत नचा रहे है. इससे डिग्री की अहमियत कहां से कम होती है. सो जिस किसी ने पॉलिटिक्स की पाठशाला खोलने की पहल की है, वह बेहद संवेदनशील व्यक्ति है, उसने देश के माथे पर बैठे अधकचरे राजनीतिज्ञों और उनकी कच्ची राजनीति से ऊब कर यह कदम उठाया लगता है. एक राज्य का शिक्षा मंत्री स्कूलों के मुआइने पर जाता है और श्यामपट पर त्रुटिपूर्ण हिंदी लिख कर चला आता है, केंद्रीय मंत्री यूएन में गलत भाषण पढ़ देता है.

दिल्ली में मुख्य मंत्री के दुलारे मंत्री को सिफारिश करना भी नहीं आता, सिफारिश कर वह सांसत में पड जाता है. कुछ नेता करोड़ों के खेल में ही ऐसे फंस जाते हैं कि किसी लायक नहीं रहते,  नया इतिहास बनाने की बात कौन कहे वे अपने पूर्ववर्तियों और इतिहास से ही सबक नहीं लेते, अब ए.राजा ने सुखराम और कलमाडी ने कोड़ा, से सीख ली होती तो.... उन्होंने भ्रष्टाचार के सुस्थापित, सुरक्षित मॉडल का पूर्वाध्ययन कर लिया होता तो..., इस क्षेत्र के पराक्रमी पुरोधाओं, भ्रष्टभूषणों की जीवनी से प्रेरणा, शिक्षा ले ली होती तो.... तो जाहिर है यह दिन न देखने पडते. वे आज भी देश की सेवा में अहर्निश लगे रहते. खैर,  अब जो हुआ सो हुआ आगे के राजाओं, कलमाडियों, चौहानों को पर्याप्त प्रशिक्षण की आवश्यकता समय और राजनीति की मांग है. 

लगता है कि आपके खाली भेजे में किसी और सवाल ने जोर मारा है, बात ठीक है आपकी, अगर पढ़ना लिखना मेहनत करना, दिमाग लगाना, प्रोजेक्ट बनाने जैसे काम करने ही हैं तो डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक, पत्रकार, वैज्ञानिक बनने की कोशिश ही क्यों न करें? क्षमा करें, आपकी सोच निहायत बेवकूफाना है. यह सब बन भी जाएं तो आप बेहद छोटे स्तर पर, सीमित दायरे में ही देश की सेवा कर सकते हैं जबकि नेता बन कर उच्च स्तर की असीमित देश सेवा के अवसर आसानी से उपलब्ध हैं, आप किसी विषय अथवा क्षेत्र विशेष के संकुचित दायरे में नहीं बंधते, सारा खुला खेत आपके हवाले है. एक बडे काम की बात, जो कोई नहीं बताएगा आपको, कान इधर लाईए जरा....लाख टके की बात यह कि नेता बन जाने पर कोई माई का लाल आपको देश सेवा करने से कभी रोक नहीं सकता, जबरिया देश सेवा कर सकने के लिए भी स्वतंत्र  हैं आप, जबकि बाकी सबकी सेवाएं, बॉस जब चाहे तब बाधित कर सकता है, समाप्त, निरस्त कर सकता है, कहीं से आजाद नहीं है आप. और बॉस ने आपकी देश सेवा से प्रभावित हो कर प्रतिस्पर्धा ठान ली, पंगा ले लिया तो यह स्थिति खुद आपको अपनी सेवा लायक नहीं छोड़ेगी देश की तो खैर बात ही छोड़िए, तो इस बात को भेजे में भली भांति बिठा लेने की जरूरत है कि,'' राजनीति ही देश सेवा का एकमात्र ऐसा माध्यम है जिसके जरिए जम कर की गई देश सेवा को देश की जनता याद रखे न रखे आपकी सात पुश्तें जरूर याद रखेंगी.''

अर्थात,  राजनीति की पढाई में ही भलाई है. यह पढाई कामधेनु है, बाकी सब बकरियां. नेतागीरी का ज्ञान आपको ज्ञानेत्तर बना देगा, आपकी अक्ल को असीम अनंत विस्तार देगा, क्योंकि यह पढाई विज्ञान, कला, वाणिज्य जैसे घिसे पिटे विषयों के सीमित संकुचित दायरे से परे होगी. सोचिए आपके पास ग्राम प्रधान से ले कर प्रधानमंत्री तक के कैरियर का कितना विस्तृत विकल्प मौजूद होगा, सोचिए अनपढ़ नेता डीलिट बराबर, पढा नेता खुदा बराबर, सोचिए जिस दफ्तर में आप बाबू बनने का सपना पाले बैठे थे वहां के साक्षात चेयरमैन चुने गए हैं......सोचिए... सोचते रहिए. यह पोस्ट पढ़िए और सोच कर बताइएगा कि इस बारे में आपको और जानकारी की चाहत है क्या? आपकी रुचि हुई तो मुझे अपनी टिप्पणी में बताइगा, फिर मैं आपको बताउंगा इस पॉलिटिक्स की पाठशाला की फैकल्टी पाठ्यक्रम, पाठ्य पुस्तकों और परीक्षा के तौर तरीकों के बारे में.