संजय श्रीवास्तव


कहते हैं झूठ की तीन अवस्थाएं होती हैं, पहला झूठ, दूसरा सफेद झूठ और तीसरा सरकारी आंकड़े. पर आंकड़े हमेशा मिथ्याभाषण करते हों ऐसा भी नहीं है. अब 66वें नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों को ही ले लें, इन अंकड़ों के विश्लेषण से कई आंखें खोल देने वाले तथ्य उजागर होते हैं. ऐसे प्यारे तथ्य, ऐसी सकारात्मक सच्चाइयां जिन्हें झूठ मानने का दिल नहीं करता. यह अलग तथ्य है कि आंकड़ों में छिपे इन तथ्यों को देखने के लिए हमें खास नजरिया विकसित करना पडेगा. जाहिर है-

सरफरोशी की तमन्ना है तो सर पैदा कर,
शौके दीदार गर है तो नजर पैदा कर.


नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़े इस बात की तस्दीक करते हैं कि हमारे गांवों, कस्बों में बनने, मिलने वाली देसी दारू अमृत धारा है, वह एक ऐसी औषधि है जिसके चमत्कारिक गुणों को अभी तक पहचाना नहीं जा सका है. वह मल्टी स्पेशिएलिटी, मल्टी टॉस्किंग, वंडर ड्रग है. हर रोग की अक्सीर और रामबाण दवा. रोग को ठीक करना? अरे! रोग को पास ही नहीं फटकने देती. मानेंगे नहीं आप! हर नई बात को अस्वीकारने की अड़ियल आदत जो है आपको.
यह तो आप मानेंगे कि हमारे गांव गरीब हैं, हमारे ग्रामवासियों की रोजाना की कमाई एक डॉलर या 45 रूपये से कम है और वे इसी में अपना गुजारा करते हैं.इसे भी मनवाने के लिए किसी आंकड़े की जरूरत है क्या? अब इस बात के आंकड़े तो आपके सामने से कई बार गुजरे होंगे कि गावों में साफ पानी, स्वच्छता, सफाई और यहां तक कि शौचालय की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है और पढाई लिखाई के कम अवसर मिलने के कारण सेहत के प्रति जनजागरूकता भी नहीं के बराबर है. देश के कुछ हिस्सों में गांववासियों को सरकारी खर्चे पर बताया जाता है कि शौच खुले में न जाएं और यह सिखाया जाता है शौच के बाद हाथ कैसे धोएं.  अंड़े, मांस,मछली, दाल, फल, और दूसरे प्रोटीन परक पौष्टिक आहार उनके रोजमर्रा के भोजन में कम होते जा रहे हैं यह ताजे आकड़े बताते हैं. यहां की हवा में वाहनों का धुआं बहुत नहीं घुला है पर बाकी प्रदूषण कम होगा इसकी भी कोई गारंटी नहीं.

सरकारी अस्पतालों की पहुंच का तो कहना ही क्या और अगर वे कहीं कहीं मौजूद भी हैं तो वहां डॉक्टर और बेहतर चिकित्सकीय सुविधाओं का होना चमत्कार ही है.निजी अस्पताल गांवों तक क्यों आएंगे?अगर सेवा का बहुत शौक चर्राया और नए ग्राहकों की खोज उन्हें खींच कर गांवों तक ले भी आई तो प्रतिदिन एक डॉलर से कम आमदनी वाले असंगठित खेतिहर मजदूर अथवा किसी स्थाई नौकरी या आमदनी का स्रोत न रखने वाले का कोई हेल्थ इंश्योरेंस तो होगा नहीं, न मोटी रकम खर्चने की कूव्वत उसमें है, ऐसे में निजी हस्पताल उन्हें मुफ्त की स्वास्थ्य सेवा देंगे या फिर गेहूं, ज्वार के बदले.साफ बात है कि उन्हें शहरों, कस्बों की तरह बेहतर स्वास्थ सेवा क्या सेहत की सामान्य देखभाल तक मयस्सर नहीं है.
विकास के इस दौर में, गांव अब वैसे नहीं रहे जिन्हें खांटी गांव कहा जाता था, वे न तो पूरी तरह गांव रहे न कस्बा बन पाए, शहर तो खैर दूर की बात है. ऐसे में गावों की जीवन शैली अब चार दशक पहले वाली नहीं रही जिसे देख कवि कहता था, ‘’अहा ! ग्राम्य जीवन भी क्या जीवन है’’. कुल मिला कर गांवों की आबो हवा और रहन सहन उतना निर्दोष, निरापद, साफ सुथरा तथा स्वास्थ्यकर नहीं रह गया है. कथित विकास ने गांवों के मूल चरित्र और उनकी सेहत की बडी कीमत वसूली है.

खैर, बात नेशनल सैम्पल सर्वे के आंकड़े की, आंकड़ा साफ-साफ बताता है कि गांववासी चाहे शहरवासियों के मुकाबले बहुत कम कमाई करें, दूसरे ऐशो इशरत पर उस कदर न खर्चें जैसे शहरी, पर एक चीज में वे शहरी लोगों का मुकाबला बराबरी से कर रहे हैं, और वह है शराब और तंबाकू पर खर्च. शहर में जहां प्रतिमाह प्रतिव्यक्ति बीयर और शराब पर 11.32 रूपए खर्च करता है वहीं गांव में रहने वाला कोई व्यक्ति प्रति माह इस मद में 11.62 रूपए खर्चता है. इसी तरह तंबाकू पर गांव का व्यक्ति 14.81 और शहर में रहने वाला व्यक्ति प्रति माह 15.06रूपए खर्चता है. जाहिर है गांवों में मंहगी विलायती शराब बहुत आसानी से उपलब्ध नहीं है और है भी तो गरीब गांव वाले सस्ती देसी दारू को ही तरजीह देते हैं. अब यह आसानी से समझ में आ जाने वाली बात है कि वहां लोग ज्यादा संख्या में, ज्यादा मात्रा में दारू पीते हैं.
एक बार फिर आपके जेहन में यह बेहद मासूम सा सवाल कुलबुला रहा होगा कि इस आंकड़े में ऐसा क्या है जो देसी दारू को दवा साबित कर दे, या फिर इससे गांव वालों की सेहत से क्या मतलब? यह बचकाना सवाल आया ही है दिमाग में तो पूछ लीजिए शरम काहे की. दर असल बात यह है कि नेशनल सैम्पल का ताजा आंकड़ा यह भी बताता है कि इतनी भारी मात्रा में तंबाकू भकोसने, और शराब गटकने, बेहद अस्वास्थ्यकर स्थितियों में रहने तथा स्वास्थ्य सुविधाओं से दूर होने के बावजूद हमारे ग्रामदेवताओं को अपने सेहत पर प्रतिव्यक्ति प्रतिमाह मात्र 57 रूपए खर्चने पड़ते हैं जबकि वहीं शहर वालों को जो गांव वालों के बराबर ही तंबाकू का सेवन करते हैं और उतनी ही शराब पीते हैं और तुर्रा यह कि उनकी तंबाकू और शराब से गांव वालों की शराब और तंबाकू से कई गुना ज्यादा परिष्कृत रहती है, फिर भी शहरी लोगों को गांव वालों के मुकाबले अपनी सेहत की मद में तकरीबन दो गुना धन प्रति व्यक्ति प्रति माह खर्चने पडते हैं.
तो जाहिर है कि कुछ तो ऐसा है जो गांव वालों की सेहत बचाए और बनाए हुए है, वह वहां की आबोहवा, खान पान, रहन सहन, शिक्षा, विकास, स्वास्थ सुविधाएं नहीं हो सकतीं यह पहले ही तय है. अंग्रेजी शराब और तंबाकू भी नहीं क्योंकि अगर यही होता तो शहरी भी तो इसका उन्हीं के बराबर सेवन करते हैं पर उन्हें तो सेहत के लिए दूना खर्चना पडता है. बस सारा अंतर देसी दारू का है. देसी दारू गांव वाले छक के पीते हैं , शहर वाले न के बराबर और इसी के चलते ही गांव वालों को अपनी सेहत पर शहरी लोगों की बनिस्पत आधा खर्चना पड़ता है. एक गांव वाले का तो दावा यहां तक का है कि, ‘यह जो सेहत पर खर्च के आंकड़े हैं वह भी उन्हीं लोगों की वजह से हैं जो पीते नहीं, अगर सब पीने लगें तो आंकडे शून्य के आसपास ही होंगे’. गांव वालों के इस अनुभवपूर्ण आत्मविश्वास का आकलन होना चाहिए. आप इसे हल्के में मत लें. देसी दारू में दम है, इस संजीवनी सुरा पर शोध होना चाहिए ताकि अगर ऐसा है तो इसके औषधीय गुणों का लाभ हर किसी को मिल सके.
थोड़ा इधर बढाना, हमें भी देना.........