संजय श्रीवास्तव


आप पूरे मामले को सुनेंगे तो बस फिस्स से हंस भर देंगे या फिर सिर झटकते हुए मात्र इतनी प्रतिक्रिया देंगे, '' मूर्खता की कोई सीमा नहीं होती''. गालिबन सच कहा आपने, कोई सीमा नहीं होती, तभी तो यह मामला हाईकोर्ट से चलकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और इस पर बाकायदा लंबी बहस चली. भला हो माननीय सर्वोच्च न्यायालय और विद्वान न्यायमूर्तियों जी. एस. सिंघवी तथा एस. जे. मुखोपाध्याय का जिन्होंने मामले की अगंभीरता और कुटिलता को आंकते हुए एक उल्लेखनीय फैसला सुनाया.
सचमुच दो दिन पहले आया सुप्रीम कोर्ट का निर्णय जितना बुद्धमितापूर्ण था, मुद्दा उतना ही बेवकूफाना. कुल मिला कर मसला यह था कि झारखंड के राज्यपाल सैयद अहमद ने अपने पद की शपथ अल्लाह के नाम पर ली थी जबकि शपथपत्र में महज दो ही विकल्प मौजूद थे, ईश्वर और गॉड के. 4 सितंबर 2011 को अल्लाह के नाम पर ली गई उनकी शपथ याची कमल नयन प्रभाकर को संविधान सम्मत नहीं लगी. उन्हें लगा कि यह देश के संविधान की अवमानना और राष्ट्र का अपमान है. वे मुस्लिम हैं तो भी उन्हें ईश्वर के नाम पर शपथ लेनी चाहिए थी और अगर उनको इसमें आपत्ति थी तो कम से कम गॉड के नाम पर शपथ लेते. कमल नयन प्रभाकर ने हाई कोर्ट में इस बावत याचिका डाली कि, चूंकि राज्यपाल ने अल्लाह के नाम पर शपथ ली है जो संविधान सम्मत नहीं है इसलिए वे इस पद पर बने रहने लायक नहीं है, उन्हें पद के लिए अयोग्य घोषित किया जाए. याचिकाकर्ता कमल नयन को इससे कोई मतलब नहीं था कि राज्यपाल अपनी ली हुई शपथ का पालन पूरी नैतिकता और निष्ठा के साथ करते भी हैं या कि नहीं, उन्हें तो बस अल्लाह के नाम पर शपथ से ऐतराज था. कमल नयन प्रभाकर ने अपने तर्क को पुख्ता करने के लिए पाकिस्तान के संविधान का भी हवाला दिया और उससे भारतीय संविधान की तुलना भी की.
खैर, माननीय न्यायधीशों ने सारी बहस सुनने के बाद अपने फैसले में कहा कि सारी दुनिया में ईश्वर को निराकार माना गया है, उसे किसी छवि या नाम के दायरे में न बांधने की कोशिश न करें, पाकिस्तान के संविधान से अपने देश के संविधान की तुलना गलत ही नहीं दुखद भी है, और याचिका खारिज करने के साथ ही यह मानते हुए कि याचिकाकर्ता कमल नयन प्रभाकर कुटिल मंशा के साथ अदालत पहुंचे हैं इसलिए उन पर पांच लाख का जुर्माना लगाया जिसे उनके वकील मिथिलेश प्रसाद सिंह के अनुरोध पर घटा कर एक लाख कर दिया गया.
फैसला निसंदेह स्वागत योग्य है पर इसके साथ कुछ और भी अपेक्षित था जैसे याचिकाकर्ता को अदालत के समक्ष इस तरह का अहमकाना मामला उठाने और अदालत का समय नष्ट करने के अपराध में और भारी जुर्माना लगाना चाहिए था या कम से कम 5 लाख का जुर्माना कम तो नहीं ही किया जाना चाहिए था. साथ ही इस तरह के अगंभीर मुकदमे की पैरवी करने के लिए उनके अधिवक्ता पर दो माह की ही सही उनके वकालत करने पर बंदिश लगाने का आदेश सुनाना चाहिए था. यह सर्वोच्च न्यायालय को सलाह नहीं बल्कि जनाकांक्षा की सामान्य अभिव्यक्ति है. हां मीड़िया को चाहिए था इस फैसले को प्रमुखता से सार्वजनिक प्रसार देता , क्योंकि न्याय सिर्फ होना ही नहीं दिखना भी चाहिए, ताकि वे लोग प्रेरणा या सबक ले सकें जो अल्लाह और ईश्वर के नाम पर विवाद पैदा कर अपना व्यवसाय चलाते हैं, दूकानदारी करते हैं. पर ऐसा हो न सका. मीडिया ने इस अदालती फैसले की खबर को बेहद कम तवज्जो दी.
सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया वह भविष्य के लिए नजीर तो बन ही गया, अब अल्लाह -ईश्वर की दूकानदारी करने वाले इससे कोई शिक्षा लेते हैं या नहीं ये तो वही जानें, हम तो बस इतना ही कह सकते हैं..... ...सबको सन्मति दे भगवान.