कुशवाहा पर आखिर इतनी कलह क्यों कि अखिरकार उन्हें कसक के साथ किनारा करना पड़ गया ? कुशवाहा जैसे कई हैं, उन पर तो कोई कुछ नहीं कहता. एक और बढ जाने से क्या आफत आ जाती. आरोप ही तो हैं कुशवाहा पर. आरोपों का क्या, बंगारू की तरह साक्षात टीवी पर तो नहीं दिखे थे? फिर येदिदुरप्पा भी तो खान और खनन के खिलाड़ी हैं. भले ही बाद में बाहर कर दिए गए हों लेकिन 2004 में डीपी यादव को भी तो अटलजी ने पार्टी में ले ही लिया था. ऐसे में कुशवाहा पर किच किच का क्या मतलब? ऐसा लगता है कि बाबू सिंह कुशवाहा का विरोध या तो ओछी राजनीति के तहत किया जा रहा है या सौतिया डाह के चलते या फिर दूरदृष्टि के अभाव में उपजी नासमझी के कारण.
जरा राजनीति से ऊपर उठ कर देखिए कि यह कितना महान काम है. वह काम जिसके लिए हमारे तो क्या दूसरों के भी महापुरुष और महामहिलाएं कह गईं हैं. ईसा से ले कर टेरेसा तक. 'चोरी से घृणा करो, चोर से नहीं. मदर टेरेसा होतीं तो आज कितनी खुश होंती. उन्होंने कहा था कि, इंसान का सबसे बड़ा दुख यह होता है कि कोई उसका अपना नहीं है, कोई उसे नहीं अपनाता, भाजपा ने कुशवाहा को अपना कर न सिर्फ मदर टेरेसा की आत्मा को शांति दी है वरन उन्हें विभीषण मान कर ही सही, अपने वहां आश्रय दे कर अनाथों के नाथ दीनानाथ भगवान राम के प्रति भी अपनी आस्था जाहिर की. परम आस्थावान पार्टी भारतीय मूल्यों में अपनी आस्था प्रदर्शित करने के इस मौके को कतई चूकने नहीं देना चाहिए था? और वह नहीं चूकी भी नहीं थी . आखिर वाल्मीकि और अंगुलिमाल का हृदय परिवर्तन हो सकता है तो बाबू सिंह कुशवाहा का क्यों नहीं, माना कि वे दोषी ही हों तो भी उन्हें सुधरने का एक और मौका क्यों नही मिलना चाहिए. भाजपा यह तर्क दे सकती है कि बाबू सिंह बसपा की संगति में किंचित बिगड़ गए हों भाजपा के सत्संग में सुधर जाएंगे. जहर जहर को काटता है, राजनीति का आदमी राजनीति में ही सुधरेगा. आखिर तुलसी बाबा कह गए हैं, 'शठ सुधरहिं सत्संगति पाईं.' फिर यह भी तो हो सकता है कि वे शठ न भी हों, साबित भी नहीं हुआ है. हो सकता है शठ होने की बजाए वे शिकार हुए हों, सचाई के.
बकौल यशवंत सिन्हा, वे सचमुच व्हिसिल ब्लोवर हों, 'वो तो पट्टे(खनन) में खा रहे थे, सीटी बजा (व्हिसिल ब्लो) रहे थे, अब माया को मिर्ची लगी तो वे क्या करें. वैसे भी इस प्रजाति के कुलस्ते, भगोड़े और सुधींद्र कुलकर्णियों जैसे व्हिसिल ब्लोवर की नई प्रजाति पार्टी ने पहले पैदा कर ही रखी है. यह रणबांकुरे खेल में गड़बड़ी है, यह दर्शाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहते हैं. कभी कभी अपने ही पोस्ट में गोल मारने से नहीं सकुचाते.
दरअसल कुशवाहा के कौशल से पार्टी के कई जन इर्ष्या रख सकते हैं, उन्हें भय का अहसास हो सकता है कि अगर इतने कुशल और कामयाब कालाकार यहां आ गए तो हमारा क्या होगा. कहीं यह विरोध इसीलिए तो नहीं.
बाबू सिंह कुशवाहा उस बांदा के रहने वाले हैं, जहां करोंड़ों का पैकेज बंटा है. जहा के अधिकतर अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले में लोकायुक्त के दायरे में है. जो बसपा में कभी नंबर दो माने जाने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी का गढ हुआ करता है. कुशवाहा उनका निजी काम देखते थे. उनकी अपार प्रतिभा को नजदीक से परख कर नसीमुद्दीन ने अपना स्वार्थ त्याग कर, उसे ताक पर रख कर राज्यहित में एक फैसला लिया. बाबू की प्रतिभा महज एक जिले में सिमट जाए यह न तो बाबू के हक में होगा न सूबे के, इसीलिए नसीमुद्दीन ने बाबूसिंह को अपनी नेता प्रदेश के मुख्यमंत्री माया जी को प्रस्तुत कर दिया. कुशवाहा मुख्यमंत्री निवास में सपत्नीक सेवा संनद्ध हो गए, पत्नी घरेलू सहायता तो बाबूसिंह टेलीफोन ऑपरेटर. इश्क, मुश्क और टेलेंट चुपाए नहीं छुपता. कुशवाहा की कामयाब कारगुजारी और बेपनाह कौशल के साथ भी यही हुआ. जल्द ही बाबूसिंह माया के खास बने, दो बार विधान परिषद में नामित हुए, मंत्रिमंडल में परिवार कल्याण और खनन मंत्री बने . कुछ और न कर महज हल्ला मचाने वालों ने शोर मचाया कि बाबूसिंह खनन के जरिए परिवार कल्याण कर रहे हैं वह भी अपना. वे गुलाबी बलुआ पत्थरों की खानों का ठेका केवल अपने और मुख्यमंत्री के रिश्तेदारों को बांट रहे हैं. क्योंकि मूर्तियों और पार्कों में अरबों के गुलाबी पत्थर सरकारी आदेश पर खपाए जा रहे हैं. उन पर दो हजार करोड के घपले का आरोप लगा. नेशनल रूरल हेल्थ मिशन में भी एक हजार करोड रूपए का गोलमाल आंका गया. मामले में ,हत्याएं भी हुई. अब अगर आरोप सच हैं तो कानून अपना काम करेगा उसे किसने रोका है. पर जब तक आरोप साबित नहीं होता बाबूसिंह की बहुमुखी प्रतिभा, क्षमता क्यों बेकार जाए, उसे क्यों रोक कर रखा जाए. चुनाव नजदीक है उनका लाभ पार्टी के लिए क्यों न उठाया जाए.
कुशवाहा अति पिछड़े यानी मोस्ट बैकवर्ड वर्ग से हैं, (हालांकि हमारे गांव में ऐसे लोगों को बहुत फार्वर्ड है भाई, कहा जाता था) उमा भारती की वजह से लोध वोट तो आ ही रहे हैं कुशवाहा वोट भी आ जाएं तो तकरीबन सौ सीटों पर लाभ मिल सकता है. अब आप ही बूझिए, सीट बड़ी या सिद्धांत.
महानता के कार्यों में पहले तमाम विघ्न आते हैं, हो हल्ला मचाया जाता है, पर बाद में इन कामों की तारीफ भी होती है, कई बार तो मजबूरन करनी पड़ती है. कुशवाहा को अपने साथ ले कर गड़करी ने जो महान कार्य किया है उसे अभी पार्टी के लोग अनुमान नहीं लगा पा रहे हैं. जब भी उनके फैसले से असंतुष्ट पार्टी का जो भी पदाधिकारी उनसे मिलने जाता है उन अनुभवहीनों को विस्तार में कैसे और क्या क्या बतलाते फिरें, इतना समय कहां , चुनाव सर पर हैं तो वे धीमे सुर में बजते इस गाने की ओर इशारा भर कर देते हैं.

यार हमारी बात सुनो, ऐसा एक इंसान चुनो. जिसने पाप ना किया हो जो पापी न हो.

और अपने फैसले के स्थगन और अपने ही पार्टी मेंबरों की कमअक्ली के दुख में खामोशी ओढ लेते हैं.