संजय श्रीवास्तव

हे पार्थ! तू क्रिकेट को देख.लाचार पितामह सचिन के प्रभावहीन और पराभूत होने पर आहत मत हो या क्रिकेटीय कौशल के आचार्य द्रोण रूपी द्रविण की खामी पर मत खदबदा. अभिमन्यु धोनी के हतभाग पर हाहाकार मत कर.तू तो केवल क्रिकेट को देख. न च दीनम, न पलायनम. तू दीन मत बन,निराश मत हो, न घबड़ा और न पलायन कर. टीवी के सामने से मत हट.बिल्कुल मत शर्मा भारत कैसा भी खेले, उसकी क्रिकेटीय दुर्दशा से इतना विह्वल मत हो.यह तो उनका प्राकृतिक या कहें नेचुरल खेल है, यदा कदा होने वाले उनके उस पराक्रमी प्रदर्शन पर न जा, उनका वह खेल जो स्थाई प्रवृत्ति से अलग और चौंकाऊ होता है, वह असली नहीं,अप्राकृतिक होता है. उस दिन हमारे किसी गेंदबाज या बल्लेबाज की किस्मत जाग जाती है या फिर दूसरी टीम का बुरा प्रारब्ध उसका कारण बनता है. तू तो बस प्राकृतिक खेल से प्रेम कर. तू उनके बहकावे पर भी मत जा जिनका क्रिकेटीय कैरियर और कौशल मुहल्ले के पार्क से पार कभी नहीं जा पाया और वे टीवी चैनल पर क्रिकेट संबंधी चर्चा कार्यक्रम के राष्ट्रीय प्रसारण के ऐंकर बने बैठे हैं. तू तो उन पर भी यकीन मत कर, जो जोड़ जुगत लगा कर दस बीस टेस्ट खेल पाए हैं और शताधिक टेस्ट खेलने वालों पर टीका टिप्पणी कर रहे हैं. क्रिकेट गरीब की जोरू या जगत भौजाई नहीं है कि हर कोई, जो बस इतना भर जानता हो कि क्रिकेट में गोल नहीं, रन बनते हैं, वह कुछ भी कमेंट करने लगे. तू इनकी कदापि न सुन, ये अज्ञानी नहीं जानते कि क्रिकेट क्या है.इन्हें क्षमा कर दे .


तू देश और खिलाड़ियों से ऊपर उठ कर विशुद्ध क्रिकेट का स्वर्गिक आनंद ले. आस्ट्रेलिया,इंग्लैंड़ अफ्रीका, पाकिस्तान,सचिन, कालिस, वार्नर, पोंटिग के फेर में मत पड़, देश और खिलाडियों के नाम तो बस माया है, माया लुभाती है पर अंतत: दुख देती है. तू इसके भ्रम से निकल, सत्य तो क्रिकेट है. तू आत्मा को, असल को, सत्य को पहचान और क्रिकेट में मन रमा. धोनी टेस्ट को अलविदा कह जाएगा, कप्तानी छोड़ देगा.हतबुद्धि, तू क्यों परेशान है?जीवन मरण कुछ नहीं है.आत्मा पुराने वस्त्र उतार कर नए पहनती है. धोनी गया तो कोई दूरा किस्मत का धनी आएगा, धोनी भी टेस्ट छोड़ दूसरे फॉर्मेट में दिखेगा ही.क्रिकेट ही शाश्वत है, बाकी तो आना जाना है.
हे पार्थ, तू टीवी वालों की तरह,अनुभवहीन,किसी बात को बतंगड़ बनाने वाला, एकांगी सोच रखकर महज वर्तमान में जीने वाला मत बन. भूत, वर्तमान और भविष्य का आकलन जानने वाले मेरे जैसे त्रिकालज्ञ जानते हैं कि भूत में भी हम गावस्कर,विश्ववनाथ, वेंगसरकर, कपिल,बेदी, चंद्रा की तरफ चमत्कार के लिए देखते थे, आज हम सचिन,सहवाग द्रविण, लक्ष्मण,धोनी, जहीर, इशांत अश्विन की तरफ देखते हैं कल कोहली,रोहित, पुजारा, यादव वगैरह की तरफ देखेंगे. पहले भी हम कई बार पिटते थे और एकाध बार मैदान मार लेते थे आज भी यही हो रहा है और कल भी यही होगा. तू इसे तटस्थ भाव से ले और शांत चित्त रह. उदिग्न मत हो.
सुन पार्थ, क्रिकेट भी जीवन दर्शन की तरह अबूझ और अनिश्चित है परंतु जो भी इसके रहस्य और सत्य को समझ लेता है वह क्रिकेट हो या जीवन उसके परमआनंद को प्राप्त हो जाता है. यही क्रिकेट है जिसमें हैंपशायर की टीम पहली पारी में15 रनों पर आउट हो जाती है उसके जवाब में वारविक शायर223रन बनाती है, दूसरी पारी में हैंपशायर 521 रन ही नहीं बनाती बल्कि वारविक को 158पर समेट कर मैच जीत जाती है, यह क्रिकेट ही तो है कि ब्रेडमैन को 99.9 पर रोक देती है, जिम लेकर को बीसवां विकेट नहीं दिलवाती, सचिन को महाशतक के लिए तरसा कर रख देती है और जता देती है कि क्रिकेट में कोई खिलाड़ी खुदा नहीं हो सकता, टेस्ट क्रिकेट का नंबर वन ऑस्ट्रेलिय47 रनों पर ढेर हो जाता है. 50 ओवर खेलने उतरी श्रीलंका महज 20 ओवरों में काल कवलित होकर 43 रनों पर सिमट जाती है. इस मैच में जिस अफ्रीका को 258 रनों की किर्तिमानी जीत मिलती है वह डरबन में मैच बचाने के लिए258 रन भी नहीं बना पाती.
उठ पार्थ, टेस्ट मैच का प्रसारण खत्म होने को है. भावनाओं को वश में कर, इसमें मत बह. महज भारतीय मत बना रह, ऊपर उठ.वैश्विक बन. वसुधैव कुटुंबकम,पूरा संसार ही एक परिवार है.क्या तेरा, क्या मेरा और तो क्या ही उनका. तू मन भारी न कर. पार्थ इसे भी निरख, भारत ने एक ही दिन में ऑस्ट्रेलिया के दस विकेट उखाड़ फेंके फिर भी वह हार के कगार पर है. इस सूत्र वाक्य पर भी ध्यान दे, 'कर्मण्येवाअधिकारमस्ते मा फलेषु कदाचन:. अर्थात हमारा वश कर्म पर है फल पर नहीं.फिर जो जैसा करेगा फल पाएगा, जब वे हताश नहीं दिखते तो तू क्यों हताश होता है.



आमीन