संजय श्रीवास्तव
जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल के तंबू- कनात उखड़ चुके हैं. आए हुए अतिथि विवाद-वितंड़ा,विचार-वमन, मानस मैथुन के बाद प्रसन्न वदन वापस लौटने की राह में हैं. कितना मौज मजा रहा, अब कितना सन्नाटा पसरा है यहां दिग्गी पैलेस में.जाने कहां कहां से, कैसे कैसे,भांति भांति के कितने तो लोग आए थे, वे जिनको हमने खूब पढ़ा है, वे भी जिनको कभी नहीं पढ़ा, वह भी जिन्हें सिर्फ सुना, पढ़ा नहीं और वे लोग भी जिन्हें केवल देखा, न पढ़ा, न कभी सुना. यहीं आ के जाना कि वे लेखक भी हैं. एक से एक सेलिब्रिटी, दर्शनीय, साहित्य सरोकार से भले दूर, पर ग्लैमर से भरपूर, मेला जो ठहरा. न सही सलमान रश्दी, विंफ्रे तो आईं. वे भी न आतीं तो हम सलमान खान से भी काम चला लेते.
खैर , मजा आया, दिन में वाइन ,बीयर के दौर, यहां वहां बतरस, वाद विवाद की गरमी,गुनगुनी धूप और मिलना जुलना, शाम को संगीत और..जो सहभागी, दर्शक, श्रोता,साहित्य सागर में चार दिन सराबोर होते रहे उन्हें इन विद्वतजनों, रचनाधर्मियों के मिलन और उनके बहस मुबाहिसे से क्या हासिल होगा या क्या हासिल हुआ, यह तो वही जानें, पर हम तो इतना जानते हैं कि ऐसे साहित्यिक मेले होने चाहिए.

कुछ बोर लोगों का सवाल था कि विचारों के बीज बो कर शब्दों की खेती करने वाले लेखकों या कहें कलम या की-बोर्ड के ज्यादातर किसानों की हालत आज भी विदर्भ के किसानों सरीखी विपन्न हैं.खास तौर पर छोटी या सीमित जोत रखने वाले वर्नाकुलर किसानों की. बड़े,विस्तृत खेत रख कर उन्नत खेती करने वाले जमींदारों या अंग्रेजी फार्मर्स की नहीं, जो इस किसान बिरादरी के बेहद अमीर, प्रभावी पर संख्या के लिहाज से बेहद मामूली हिस्से हैं.
देश के 90फीसदी से ज्यादा लेखक गरीब हैं, और जो दस फीसदी खाते पीते और अमीर लेखक हैं वे भी फुल टाइमर लेखक नहीं हैं. वे लेखन की वजह से अमीर नहीं हैं बल्कि इसकी वजहें कुछ दूसरी और रास्ते और हैं. इसके ठीक उलट , इस देश में 90फीसदी प्रकाशक खाता पीता और अमीर है. जो दस प्रतिशत गरीब हैं वह धंधे में नया है या फिर फुलटाइमर नहीं है. इस धंधे में बिचौलिए और आढ़तिए की भूमिका वितरक और प्रकाशक मिल जुल कर संभालते हैं. सारा माल थोक सरकारी खरीद, लाइब्रेरीज की किताब अथवा अनाज मंडियों के बिचौलिए, दलाल चट कर जाते हैं. शब्द हो या जिंस, इनके जरिए बाजार तक उसकी पहुंच तो सुनिश्चित हो जाती है परंतु न तो किसानों को अपनी उपज का पूरा दाम मिलता है, न लेखकों को.

अब इन ओल्डस्कूल लोगों को कौन बताए कि साहित्य समाज का दर्पण होता है. समाज पर हावी है बाजार तो फिर बाजार के लिए लिखो, बेचो, बिको,थोड़ा बाजारू बनो, सीरियल,फिल्में, फिल्मी गीत, विज्ञापन लिखो. पैसा उठाने के लिए थोड़ा झुकना पड़ता है, किरदार और मयार को नीचे लाना पड़ता है,पर आप ऐसा कुछ नहीं करेंगे सिवाय स्यापा करने के.
अच्छा हुआ आप जैसे लोग यहां नहीं आए, आते तो सारा मजा किरकिरा हो जाता. कहते किताबों को सस्ती करो, इन्हें सरकारी खरीद और पुस्तकालयों की आलमारी से निकाल कर गांव कस्बे के लोगों तक पहुंचाने का रास्ता ढूंढो.डिजिटिलाइजेशन के दौर का कहर किताबों पर किस तरह और कितना पड़ेगा, इसके बारे में बहस करो.
आप जैसे लोग साहित्य के सच्चे दुश्मन हैं, जिस दिन यह जश्न शुरू हुआ उसी दिन चीन में एक लेखक ली तिए को जेल हो गई. चीन में तीस दिनों के भीतर इस तरह का यह तीसरा वाकया था, आप होते तो तमाम अटपटे सवाल खड़े करते, चेन वई, चेन शी, चेन वी और लियू श्याबाओ तक को इसमें घसीट लाते और बताते कि पिछले साल रूस , बेला रूस, तुर्की,इरान, क्यूबा जैसे तमाम देशों में लेखकों के खिलाफ दमन की 647 बड़ी घटनाएं हुईं है. पहले इस पर विचार करो. दो चार घड़ियाली आंसू के हकदार हैं ये लेखक बिरादरी के ये साथी. खैर कुछ नहीं कहूंगा, इस तरह के सेंटीमेंटल सवाल खड़े करके किसी के मौज मजे में खलल ड़ालना तो आपका पुराना शगल रहा है.
संकीर्ण सोच और सीमित दायरे वाले आप जैसे लोग खास सिंड्रोम से ग्रस्त हैं, आप कहेंगे कि फेस्टीवल केवल अंग्रेजी के लेखकों के लिए ही था, आप जैसे दकियानूसी और पिछड़े हुए लोग इस पर कुतर्क जरूर करेंगे कि जो लेखक चीनी, मंडेरिन,अरबी या पोलिश में लिखते हैं क्या वे लेखकीय बिरादरी से बाहर के समझे जाएंगे,स्काटलैंड का कोई सेल्टिक लेखक अपनी भाषा गेलिक या आयरलैंड़ के लोग आयरिश में लिखें तो क्या वह लेखन नहीं है, जब तक वह अंग्रेजी में न लिखे.या फिर उसकी किताबें अंग्रेजी में अनूदित न हो जाएं? या तो उसके नाम एक दो बेस्ट सेलर हों या खुद को सेल करने का उसको बेस्ट तरीक आता हो.भले वह रश्दी और तसलीमा जैसा बेहद कमतर दर्जे का साहित्यकार क्यों न हो पर वह मशहूर हो, अथवा उसकी न्यूसेंस वैल्यू हो तभी उसे बड़े लेखक के रूप में पहचाना जाएगा? बुलाया जाएगा?
अब आपको कौन बताए कि यहां कई देशों के लोग और दूसरी भाषाओं के लेखक भी आए थे भले ही वे इक्का दुक्का थे पर थे तो,चीनी लेखिका एमी झुआ थी अब उन्होंने अपने देश के लेखकों की दुर्दशा की चर्चा नहीं की या फिर गुलजार साहब की उर्दू कविताओं को अंग्रेजी अनुवाद करके सुनाया गया तो क्या? ये ऐसे लेखक हैं जिनकी पहचान देश और भाषा से ऊपर उठ कर बन चुकी है. खैर,आपको समझाना बेकार है.सात आठ करोड़ खर्च हो गए और आपको मजा ही नहीं आया. आप निगेटिव लोग हैं, निगेटिव ही रहेंगे.