महोदय, आपसे कुछ कहने का साहस जुटा रहा हूं. वैसे ऐसा तो कुछ नहीं है जो नागवार गुजरे फिर भी अग्रिम क्षमाप्रार्थी हूं, आशा है कर ही देंगे, कहां तो मैं अदना सा आम पाठक और आप न्याय की महामूर्ति, जाहिर है क्षमा बड़न को चाहिए..... महोदय! पिछले कुछ महीनों के दौरान अखबारों में छपी खबरों से मुझे ऐसा लगा कि कुछ अवकाशप्राप्त वरिष्ठ न्यायधीशों, न्यायमूर्तियों को लगता है कि मीडिया और उसके लोग अक्षम, गैरजिम्मेदार भ्रष्ट और निरंकुश होते जा रहे हैं. कोर्ट की रिपोर्टिंग के लिए विधि विशेषज्ञ रखे जाने चाहिए और मीडिया के कामकाज को नियंत्रित करने के लिए कानून बनने चाहिए.
सच है, कबड्डी जानने वाला कला महोत्सव की क्या खाक खबर लिखेगा? फिर कानून तो बहुत ही संवेदनशील विषय है. कोर्ट की खबर तो वही लिखे जो कानूनविद हो, हम पाठकों के भी हक में यही है, पता नहीं सही कह रहा हूं या गलत पर न्यायमूर्ति महोदय इस तर्क के साथ तो यह भी जुड़ता है कि मीडिया की खबर लेने वालों, उस पर टिप्पणी करने वालों को भी मीडिया की समझ होनी चाहिए या नहीं ? अब इस बारे में आपके निर्देश से क्या भला बुरा होगा एडीटर्स गिल्ड जाने हम पाठकों को क्या.
जो भी हो टीवी तो खबर के नाम पर ऊटपटांग चीजें परोस ही रहा था, उसकी विश्वसनीयता खात्मे की तरफ है तो अखबार भी जाने क्या-क्या और कैसी चीजें छाप रहे हैं. एक गलत खबर किसी व्यक्ति विशेष, देश, समाज का भारी नुकसान पहुंचा सकती है, लगता है मीडिया वाले शायद यह भूल गए हैं. इन्हें यह याद दिलाते हुए कि यह उनकी नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है इस तरह की उनकी अक्षमता, गैरजिम्मेदारी पर सजा मिलनी चाहिए. आखिर कानून सबके लिए है, सब पर लागू होना चाहिए मीडिया न उससे अछूती है न होनी चाहिए. पर हे न्याय के ईश क्या सभी न्यायिक फैसले शतप्रतिशत सही होते हैं, यदि हां तो सेशन कोर्ट के फैसले हाई कोर्ट द्वारा और हाई कोर्ट के सुप्रीम कोर्ट द्वारा बदल क्यों दिए जाते हैं? अगर बरसों खर्च कर दिए गए पिछले अदलती फैसले सही नहीं पाए गए तो क्या गलत फैसले देने वाले पर अक्षमता, अकुशलता की सजा आयद नहीं होती, आखिर एक अदालती फैसले से भी तो देश, समाज और किसी व्यक्ति विशेष को खासा नुकसान पहुंच सकता है? खैर, न्यायिक जवाबदेही विधेयक पास तो हो गया है फिर भी क्या आज तक ऐसी कोई विधिक व्यवस्था बन पाई है कि जिसके तहत उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायधीशों के विरुद्ध हम आमजन किसी तरह का न्याय मांग सकें? बस यूं ही पूछा लिया न्यायप्रवर, आम आदमी के पास जिज्ञासा ही तो है, बुद्धि कहां.
कुछ समय पहले खुद मीडिया वालों ने उजागर किया कि कतिपय नामी पत्रकार लेन देन जोड़ जुगत में शरीक हैं. जिन्हें हम तेजतर्रार रूप में टीवी पर निरखते थे, जिनका लिखा बड़े ध्यान से पढते थे वे ऐसे निकलेंगे ऐसा इमकान तक न था. बड़ा क्षोभ हुआ, पर दुख तब भी कम नहीं हुआ जब न्याय के कुछ मजबूत खंभों के भ्रष्टाचार के घुन से ग्रस्त होने की पुष्ट खबरें सामने आईं. छोटे मंझोले दर्जे के पत्रकार बहुत मामूली रकम या उपहार इत्यदि लेकर खबर छाप या रोक देते हैं, मीडिया में बाकी जगहों से कम भ्रष्टाचार है यह कहने वाले हमारे एक मीडियाई मित्र ही यह स्वीकार चुके हैं. पर माफ कीजिएगा महोदय मैंने खुद तमाम वकीलों, पेशकारों और कोर्ट के दूसरे कर्मचारियों को ऐसा ही कुछ करते देखा है. नहीं मैं मीडियाई भ्रष्टाचार की तरफदारी नहीं कर रहा, महज अपना भुक्तभोग बता रहा हूं.
महीने भर पहले मैंने किसी अदालती बहस मे दिए गए तर्क को हास्यास्पद बताने पर तीखी प्रतिक्रिया पढी. हे सत्य के सर्वमान्य रक्षक आप ही बताएं यदि देश समाज का खास नुकसान न हो रहा हो और तर्क सचमुच हास्यास्पद हो तो उसे हास्यास्पद कहने में क्या हर्ज है, अवमानना की आड़ में सत्य की हत्या क्यों हो. न्यायपालिका सर्वशक्तिमान है, ऐसे में वह अपने दिए फैसलों पर टिप्पणी से इतनी भयग्रस्त क्यों रहती है, इसकी अनुमति न होना ईश निंदा या ब्लॉसफेमी जैसे कट्टर कानून की याद नहीं दिलाता क्या? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की याद तब किसी को क्यों नहीं रहती? फिर कहूंगा कि यह महज सवाल है जो एक सामान्य पढे लिखे आम आदमी के जेहन से निकला है, कुछ गलत हो तो क्षमा!
मैंने अपने एक मीडियाई मित्र से पूछा, ‘आप का क्या कहना है? वे बोले, ‘मीडिया की गुणवत्ता, स्तर और साख लगातार गिरावट पर है, पर न्यायपालिका भी इसकी कम शिकार नहीं, हालांकि न्यायपालिका इतनी सजग न रहती तो अब तक देश का जाने कितना बंटाधार हो चुका होता. पर एक बड़ा अंतर उनमें और मीडिया में यह है कि हमारे वहां कट, कॉपी, पेस्ट यानी दूसरे की सामग्री को हेर फेर कर अपना बनाना सबसे बुरा माना जाता है पर उनकी तो यही आधारशिला है ...... . उनका आशय इससे क्या था यह तो वही जानें, मीडिया वाले ठहरे, उनकी बातों में कई अर्थ होते हैं. लेकिन महोदय मैं तो सीधा सादा आम आदमी हूं और सीधी बात कहता हूं, इसलिए अज्ञानतावश कुछ गलत कह गया तो एक बार फिर क्षमा.
देश के कानून में गहरी आस्था और अपने न्यायमूर्तियों पर गर्व के साथ एक आम आदमी