संजय श्रीवास्तव


'हम तो लुटी पिटी जनता हैं, हमारे पास और चारा ही क्या है? हम शहीद होने के लिए तैयार हैं, अब फैसला जनता को करना है कि वह हमारे साथ आती है कि नहीं', केजरीवाल के इस कथन से हताशा झलकती है, वे इस असमंजस, अनिश्चय, अविश्वास और उहापोह में हैं कि भीड़ जुटेगी कि नहीं. भीड़ नहीं उमड़ी तो क्या होगा? लोगों को आंदोलन को काठ की हांडी या बासी कढी में उबाल कहने का मौका तो नहीं मिलेगा? वे भीड़ के भरोसे हैं, ठीक वैसे ही जैसे कोई मजमेबाज, नजूमी, नट, बाजीगर, या साधारण कलाकार होता है. इन्हें भीड़ पर भरोसा है. होना तो यह चाहिए कि भीड़ का भरोसा इन पर हो, इनमें हो. पर है उल्टा, ये लोग भीड़ के भरोसे हैं. भीड़ पर इन्हें पूरा भरोसा नहीं कि जुट ही जाएगी.
टीम केजरीवाल भीड़ दिखा कर भ्रष्ट नेताओं को भयभीत करना चाहती है, पर भीड़ की कम आमद की आशंका से खुद ही भयभीत है. अन्ना समर्थित अपने ‘ग्रैंड शो’ की पूर्व संध्या पर केजरीवाल ने भावुक अपील की कि वह आमरण अनशन करने जा रहे हैं, सरकार कोई उचित कार्यवाई नहीं करेगी तो जान दे देंगे, यह आखिरी तीर था. आखिर इतना सुनने के बाद तो जनता आनी ही चाहिए, इससे ज्यादा क्या कह-कर सकते थे वे. टीम अन्ना के लोग उम्मीद बढाते हैं- हम जहां-जहां गए हजारों की संख्या में लोग हमारी सभाओं में आए. आमरण अनशन की पूर्व संध्या पर थोड़ी बयानबाजी हुई लेकिन आंदोलन की तैयारियों की कोई खबर सुबह किसी भी अखबार की सुर्खी नहीं बनी. इससे संबंधित कोई आलेख, विवरण, तस्वीरें कहीं नहीं छपीं, टीवी ने भी कोई हाइप नहीं दी.
 
यह अलग बात है कि टीवी कैमरों की तैनाती हो चुकी है. अन्ना के तीन तिलंगे केजरीवाल, मनीष सिसौदिया और गोपालराय मंच पर दूसरे प्रमुख अनशनकारियों के साथ होंगे. भाषण, नारे, गीत-गान भी, सब कुछ पहले की तरह होगा पर इस बार अन्ना महज गेस्ट एपियरेंस में रहेंगे. टीवी स्क्रीन पर यह इवेंट प्रमुखता से दिखाया जाएगा. पर क्या पहले की तरह, जोश खरोश के साथ, एक पक्षधरता के साथ, अनवरत........ फिलहाल ऐसा लगता नहीं. अन्ना तो सफल रहे, पर केजरीवाल का प्रथम प्रयास पर्याप्त प्रभावी बन पाएगा? और यही टीम केजरीवाल की चिंता है जो हताशा भरे बयानों से परिलक्षित होती है.
 
यह तमाशा नहीं है फिर भी भीड़ जरूरी है, भीड़-भीड़ को खींचती है. चैनल पर भीड़ जंतर-मंतर से जहानाबाद तक पहुंच जाती है. केजरीवाल भीड़ के महत्व को जानते हैं, भीड़ के बिना बड़े बड़े बस भाड़ झोंकते रह जाते हैं. भीड़ के जरिए ही भाड़ फोड़ा जा सकता है. भीड़ ही आंदोलनकारियों के लिए खाद, पानी, हवा है. भीड़ गायब तो सब हवा ही हवा है. भीड़ चाहिए, भले ही भ्रष्टाचार भगाओ आंदोलन में आई भीड़ में भ्रष्टाचारियों की ही बहुतायत हो. पर क्या यह किसी भी सच्चे आंदोलन या आंदोलनकारी के लिए परमावश्यक है, क्या जेपी गांधी इतने भीड़ापेक्षी थे? क्या अन्ना ने अपने आंदोलनों के लिए भीड़ की इतनी चिंता कभी की ? नहीं. तो आखिर आज ऐसा क्यों है कि जो भीड़ भ्रष्टाचारी नेताओं के लिए जरूरी होती है वह भ्रष्टाचार से लड़ने वालों के लिए भी उतनी ही जरूरी हो चली है.
 
भीड़ का क्या है. वह समदर्शी होती है. जो भीड़ भ्रष्टाचारी नेता, दोयम दर्जे के अभिनेता-अभिनेत्री की सभा में जुटती है वही भीड़ भ्रष्टाचार भगाओ के मुहिम में भी आ जाएगी. जो भीड़ सर्वधर्म समभाव के जुलूस में शोभा बढ़ाती है उसमें से कुछ दंगे में शरीक हुई मिल सकती है. भीड़ के भरोसे नेताओं को भयाक्रांत किया जा सकता है पर सीमित समय के लिए क्योंकि वे आंदोलनकारियों से ज्यादा माहिर और परंपरागत कुशल गड़ेरिये हैं. केजरीवाल उसी भीड़ के भरोसे हैं जो चुनावों में ‘मतदान अवश्य करना चाहिए के राजनेताओं द्वारा रचित और प्रतिपादित भ्रामक नारे का घोष करते हुए मतदान में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते हुए तकरीबन हर बार गलत प्रतिनिधि चुनती है और कर्मदंड भुगतते हुए रोती बिसूरती है. भीड़ कुपथगामी बाबाओं के गिर्द भी जुटती है जिसका बड़ा हिस्सा भंड़ाफोड़ के बाद भी उनके साथ बना रहता है. दरअसल कोई आंदोलन, आंदोलनकारी, भीड़ के भरोसे नहीं खड़ा होता. वह अपना काम ईमानदारी से करता है भीड़ खुद उसके पीछे आती है उसी भीड़ का कुछ बेहतर अंश उसके साथ जुड़ उसके लिए काम करता है, आंदोलनकारी का आंदोलन सफल रहता है. काश! केजरीवाल सरीखे यह समझ पाते और भीड़ के आने न आने की परवाह किए बिना अपना काम करते.