संजय श्रीवास्तव
आज देर शाम कुछ लोगों की साजिशी महत्वाकांक्षाओं ने एक व्यापक जनांदोलन की भ्रूण हत्या कर दी. आंदोलन के मरने का दुख तो है, पर सबसे खतरनाक होता है सपनों का मर जाना. अन्ना अंदोलन ने जिस घड़ी राजनीति की राह पकड़ लेने का आत्मघाती निर्णय लिया तत्क्षण ही उस सपने का गर्भपात हो गया जिसे उन तमाम देशवासियों ने संजोया था जो उम्मीद से थे. दम है तो राजनीति में उतरो हिम्मत है तो चुनाव लड़ो, हम उन के उकसावे में कतई न आते अगर हमारे बीच कुछ छद्म और जल्दबाज आंदोलनकारी न होते. जो वे चाहते थे वही हुआ, पर कितनी आसानी से. ज़हर से ज़हर मिटाने, लोहा से लोहा काटने या कांटे से कांटा निकालने की बात भले ही सच हो पर मैले से मैला धोने वाला यह महत्वाकांक्षी सत्प्रयास अंतत: मैलामेट कर के छोडेगा, तय है. इतिहास गवाह है कि चेलों ने अज्ञात गुरु को ख्यात बनाया है पर तमाम उदाहरण ऐसे हैं जिसमें चेलों नें उन्हें कुख्यात होने पर मजबूर किया कई को तो लात तक खिलाई. राजनीति में उतरने का मन अन्ना का होगा? यकीनन नहीं. उन्हें सामाजिक आंदोलनों की ताकत में पूरा यकीन होगा यह उन्होने अपनी आंखों से देखा है. निस्संदेह यह फैसला उनके भूषणों, बेदियों का होगा. अन्ना ने जब भी कुछ कहा है साफ-साफ, समझदारी भरा, सीधे साधे तरीके से, हां......जो कहलवाया गया उसके बारे में ऐसा नहीं कह सकते. पर टीम अन्ना के लोगों की विनम्रता, पारदर्शिता, और त्याग प्रदर्शन के चोगे से आक्रामकता, महात्वाकांक्षा, पसंदगी का छुपाव झांक ही जाता है. वे औसत बुद्धि, अल्पानुभवी और बतौर रणनीतिकार खासे कमजोर हैं. कुछ की पूछ भले हो पर उम्रदराज होने के बावजूद परख अभी बांकी है. मोदी से लेकर मुद्दे तक उनका भ्रम पसरा रहता है. जनांदोलन की व्यापकता को छोड़ कर राजनीति की संकीर्णता में समाना बुरा था, तो ऐसे शिष्यों का साथ तो और भी बुरा. इसका हश्र सोचो तो ‘लौंडों की दोस्ती और ढेले की सनसनाहट’ वाला मुहावरा अचानक याद आ जाता है. सच कहता हूं, अन्ना अगर रामशलाका प्रश्नोत्तरी में इस प्रश्न का जवाब ढूंढें कि क्या मेरा प्रयास सफल होगा तो निस्संदेह प्रत्युत्तर में यही दोहा निकल कर आएगा, ‘उधरे अंत न होई निबाहू, कालनेमि जिमि रावन राहू’ ................यानी बुरे मनुष्यों का साथ त्याग दें, सफलता में संदेह है. टीम अन्ना के राजनीति में उतरने की खबर पर एक दिलजले ने जुमला उछाला, ’ बड़े बड़े बहे जाएं अन्ना कहें कितना पानी’ यह गलत है. सरकार ताकतवर है, और हमारी बात नहीं मानती तो हम संघर्ष छोड़ दें कतई नहीं. पहले भी तमाम प्रयास विफल रहे तो क्या कोशिशें ताक पर रख हाथ पर हाथ रख बैठ जाएं.? राजनीति में नकारात्मक तत्व ज्यादा है तो क्या हम दूर से दामन बचा कर निकल लें. इसकी सफाई दुष्कर है, कार्य कठिन है तो क्या कतरा कर निकल लें, बिल्कुल नहीं. पर डकैतों को उनके गैंग में भरती हो कर ही सुधारा जा सकता है, डकैती की समस्या दूर करनी है तो डकैती डाल के देखो? इसका क्या अर्थ. वैकल्पिक रास्ते हो सकते हैं. जनता में ताकत होती है, कुछ लोग इसे सिर्फ वोट से तौलते हैं पर इससे इतर भी उसमें वह शक्ति है जो बड़े बड़े आताताइयों का तख्त पलट देती है, मुल्कों को आज़ाद करा लेती है. और यह ताकत उसमें व्यवस्था द्वारा प्रदत्त वोट की ताकत से पहले ही मौजूद होती है. इस ताकत को सभी जानते हैं, अन्ना और टीम अन्ना भी. फिर भी इसकी बजाए राजनीति या वोट की ताकत पर ज्यादा भरोसे का मतलब इस ताकत को कम आंकना है. जनता पर अविश्वास या आधा-अधूरा विश्वास कर राजनैतिक जोड़ तोड़ पर अधिक भरोसा करना है. काश इतनी जल्दी यह भरोसा न टूटता. जनांदोलन में तो आप आज़ाद है, आपके समर्थक स्वतंत्र हैं, वे किसी भी सोच, राजनैतिक विचारधारा या दल से हों अपको समर्थन देते रह सकते हैं, पर पार्टी बनने के बाद उन्हें पिछलग्गू होना पड़ेगा, जो भी जिस पार्टी का पालतू होता है उसे पार्टी की गलत बातों को सच ठराने के लिए झूठे तर्क गढने हेतु प्रतिबद्ध रहना होता है, अन्ना के दल को भी यह करना पडेग़ा. पॉलिटिक्स में पारदर्शिता का एक पर्याय नंगनाच भी है. गठबंधन के जमाने में जाने कितनी तरह के समझौते करने पड़ेंगे, भ्रष्टाचार भगाओ का लक्ष्य और कार में बैठ कर कार का पहिया बदलने जैसा विचार की राजनीति के भीतर रह कर राजनीति सुधारेंगे, सब इस संतुलन साधने में हवा हो जाएंगे. जनता जो आज समर्थन दे रही है तमाम खानों में बंट जाएगी. पार्टी बन जाएगी, तमाम उद्योग पति धनपशु निस्वार्थ भाव से आगे आ कर देश सेवा में पैसे दे देंगे, महज तीन सालों में देश भर में व्याप्ति हो जाएगी. व्यापक जनसमर्थन मिलेगा बाकी सारे लोगों का सफाया हो जाएगा बस टीम अन्ना ही जीतेगी. प्रबल और स्पष्ट बहुमत मिलेगा किसी की जरूरत नहीं पडेगी. बिना किसी समझौते के सरकार बन ऐसी सरकार जिसमें शत प्रतिशत ईमानदार लोग होंगे. एक अदद ईमानदारों का सरगना भी ढूढ लिया जाएगा. उस पर न मंदिर वालों का जोर होगा न मस्जिद वालों का, न अमेरिका का न रूस का न वाम से प्रभावित होगी न दक्षिणपंथियों की न मध्मार्गियों की, बस जनता की सुनेगी. सारे कानून जनहित में बदल जाएंगे, भ्रष्टाचार वगैरह खत्म हो जाएगा. पूरा देश, गांव सहित सुधर जाएगा. यह सब यही पीढी देखेगी, यह इस दिवादर्शी पार्टी का दिवास्वप्न हो सकता है पर सच यह है कि सूपड़ा साफ कर देने वाला जनादेश नहीं मिला तो जनांदोलनों के नायकों को पुरानी पार्टियों के घाघ नेताओं की विरुदावली गानी पड़ेगी. चेले तो जीत कर चले जाएंगे अगर उनका राजनीति में उतरने का मन है तो वे यह सब कर लेंगे. पर अन्ना !! ...अन्ना का क्या होगा? क्या उनकी स्थिति दीवार से लगी खड़ी सीढी की तरह होगी, क्या उनके पास वापस लौटने, भूल सुधार और पश्चाताप का समय बचेगा. जिन्होंने कुछ जुनूनी उम्मीदें बांध रखी होंगी वे उन्हें इसके बाद इतना समय देंगे? शायद नहीं. खैर अन्ना यह जानते हैं कि केंद्र में जो भी समाए वृत्त पर निर्भर रहे, एक दो सिरफिरे थे जो परिधि से बाहर रहे. वे बाहर रह कर चुनाव लड़वाएंगे , किंग मेकर, नीति निर्धारक रहेंगे. अगर राजनीति इतनी जरूरी है तो यह दूरी क्यों? रिमोट कंट्रोल से चलने वाली पार्टियों व सरकारों का हश्र सबके सामने है.