संजय श्रीवास्तव
संघ के वरिष्ठ आडवाणी और अटल को पार्टी का जुड़वा बैल मानते आए हैं, वे इन्हें अलग अलग क्या मानते हैं यह तो पता नहीं, फिलहाल आडवाणी अकेले पड़ गए हैं और पार्टी की गाड़ी खींचने से भी दरकिनार हैं. बैठे बैठे पगुराने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है.
अमूमन चुनौतियां देते, चीखते लौहपुरुष आज चुप थे. चोर निगाहों से टीवी स्क्रीन पर निगाह फेर नजर तुरत हटा लेते थे. साथ बैठे सियासी प्रबंध, प्रपंच और प्रचार के महारथियों को मालूम हो चला था कि वे मुगालते में थे, खिली बांछों के साथ घूमने वाले बगलें झांकने के लिए मजबूर थे. उनके कई सिपाहसालार शराब सीख पर ड़ाली कबाब पैमाने में जैसी खब्तुलहवासी की हालत में थे. अधिकतर की स्थिति ऐसी थी की जैसे उनके प्रशस्त पिछवाड़े पर प्रचुर शक्ति वाला पाद प्रहार पड़ा हो और वे रजास्वादन को विवश हों. उफ्फ!! जाने कैसे कैसे मंजर सामने आने लगे, गाते गाते लोग चिल्लाने लगे. और वे, वे तो वह किताब ढूंढ रहे हैं जिसमें इस बियाबान से निकलने का कोई रास्ता, कोई नक्शा दिया हो. आहत हैं आडवाणी. इस तरह कोने में पड़ जाना उन्हें जरा नहीं सुहा रहा. सियासी समंदर का ज्वार उतर चुका है, चहुंओर सन्नाटा है, सियासी सफर में सन्नाटा सबसे ज्यादा सालता है. पराजय पहले भी झेली है आडवाणी ने पर इतने पराभूत इतने पशेमां नहीं रहे. आडवाणी की समझ में नहीं आ रहा है कि चहुं ओर उजाला, होप बस उनकी तरफ ही क्यों है घटाटोप? वह भी जईफी के इस दौर में चौरासी बरस का सिन और ये दिन, समय सत्वर सरकता जा रहा है, रीता रीता सा बीता जा रहा है. क्या कुंडली में वाकई प्रधानमंत्री योग नहीं है, क्या उप प्रधानमंत्री पद ही प्रारब्ध की पराकाष्ठा थी? क्या सबसे ज्यादा समय तक नेता विपक्ष बने रहने का किर्तिमानी होने के अलावा कुछ और बड़ा कभी हासिल नहीं होगा. आडवाणी आकंठ सोच में डूबे हैं. जाने कहां से उनके कानों में यह आवाज अब भी बार बार गूंजती है, एक बार जाल डाल रे मछेरे, जाने किस मछली में फंसने की चाह हो. पर पानी कुछ उतरे, झंझावात थमे तो जाल डालें, इधर जीवन का पानी उतार पर है तो उधर पार्टी ने पानी उतार लिया. पानी उतरने में हो सकता है पांच साल लग जाएं. यह अंतिम मौका था, यदि इसे अंतिम से पहले का मौका मान भी लें तो क्या पता अंतिम मौके की परिणिति भी ऐसी ही हो. फिर तो कोई मौका बाकी न रहेगा. रणछोड़ बनना भी ठीक नहीं, तो क्या मैदान में फिर लौट चलें. क्या उनके सफल सियासी सूत्र जिनसे तमाम समीकरण हल किए हैं अब समीचीन, सटीक और सार्थक नहीं रह गए. फिर आखिर इस पराभव, परिस्थिति से पार पाने के पैंतरे आखिर क्या हो सकते हैं.यह प्रस्तरी प्रश्न, प्रतिक्षण, प्रमुदित, प्रहर्षित, प्रगल्भ और प्रवाहमय रहने वाले आडवाणी के आगे है. बीते दिन की याद सताती है जब चुनाव से बहुत पहले ही पार्टी ने प्रचारित कर दिया था कि यदि पार्टी पराजित नहीं हुई तो परिणाम पश्चात पार्टी प्रमुख रहे आडवाणी ही प्रधानमंत्री पद गहेंगे. प्रत्याशा में लगे पार्टीगत प्रतिस्पर्धियों, परोक्ष प्रतिद्वंदियों को अब और प्रयासरत रहने, प्रपंची पराक्रम दिखाने या परेशान होने की आवशयकता नहीं. इस अनुदेशी आह्वान के बाद आडवाणी एक बार फिर सुर्खियों के सबब बन बैठे थे. तब आडवाणी ने मोदी की प्रखर होती महात्वाकांक्षा के महत्व को नकार कर और इसे मीडियागढंत माना, इस मामले में दिए गए मनमोहनी बयान को नौसिखिया नातजुर्बेकार के बोल बताए लेकिन इस बात में बजन कम न था कि अटल की अस्वस्थता और मोदी का बढता महत्व ही उनके आरोहण का आधार बना पार्टी जानती थी कि मोदी मुदित हुए (जीते) तो आडवाणी आखेट की आशंक है अत: आड्वाणी का औचक आरोहण ही इस आशंका का अकसीर इलाज है. केंद्र पर काबिज होने की मोदी महात्वाकांक्षा का रथ मंजिले मकसूद पर न पहुंचे, वह रथ राज्य में ही रुका रहे इसके लिए आकाओं ने महारथी आडवाणी का रथ उनके रास्ते में अडाय़ा था. पर यह दांव न पार्टी के कम आया न आडवाणी के. खैर, नेता विपक्ष पद पाने के लिए पार्टी में फिर जोड़ जुगत न शुरू हो जाए उठापटक न मचे इसलिए एक बार फिर जाते हुए आडवाणी का आह्वान पार्टी ने किया. मान मनौव्वल से मान जाने की पुरानी आदत होने के नाते वे मान भी गए. पर इतने भर से क्या होता है, अब तो वह भी नहीं. सियासी चौसर के चौकन्ने चैंपियन की चाहत तो हमेशा से प्रधानमंत्री पद की रही है. छाया प्रधानमंत्री, उप प्रधानमंत्री, पर प्रधानमंत्री?? पूरे देश में कमल खिलाने, देश को कीचड़्मय बनाने की आडवाणी आकांक्षा लगता है अब काठ की हांडी हो चुकी है. सांगठनिक सूत्रों के सघन संजाल पर सतत सतर्क दृष्टि रखने वाले आडवाणी तोगड़िया, सिंघल ठाकरे या साध्वी सरीखे अनर्गल अनृत्य आख्यानों के आदिगुरू भले न हों पर आलोचकों के अनुसार आगलगाऊ उद्गारों से आडवाणी का आगार भरा पडा है. हांलाकि उनकी जुबान की कमान से निकले बयान इतने संयमित होते हैं कि वे सिर्फ तपिश पैदा करते हैं, राजनैतिक तापमान बढाते हैं, लोगों को तपाते हैं, तप्त करते हैं, कुछ को कुछ सुलगाते हैं. अनुशासन और सैद्धांतिक अकड आडवाणी के सिद्ध सियासी सूत्र हैं. उनका हार्डॅलाइनर हिंदुत्ववादी, राष्ट्रवादी सिद्धांत भले ही मोदी सरीखा हाहाकारी न हो पर हमलावर शैली का जरूर दिखता है. संघ के वरिष्ठ आडवाणी और अटल को पार्टी का जुड़वा बैल मानते आए हैं, वे इन्हें अलग अलग क्या मानते हैं यह तो पता नहीं, फिलहाल आडवाणी अकेले पड़ गए हैं और पार्टी की गाड़ी खींचने से भी दरकिनार हैं. बैठे बैठे पगुराने के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा है. दल में आडवाणी को जो मान और कमान हासिल थी वह किसी को नहीं थी पर अब कहां की कमान और बिन कमान कैसा तो मान. आडवाणी ने भी दल के मूल को कभी नहीं तजा, शाखाओं प्रशाखाओं पर विचरते हुए आडवाणी शीर्ष पर अवस्थित हुए तो यह उनकी निष्ठा , निष्णातता, निपुणता दर्शाता है. दूसरे नेताओं की तरह समय देख कर काटने- चाटने वाला मीडियाई रिश्ता वे नहीं रखते. मीडिया को मैनेज करने, मैनेज किए रहने में वे माहिर माने जाते रहे हैं. जोशी, अटल और संघ से आडवाणी के छत्तीसी आंकड़ों,दरकन दरारों की खबरें खबरची खूब देते रहे पर आडवाणी के संग-साथ, सांठ-गांठ पर कभी असर न डाल पाए. निस्संदेह वर्तमान व्यथित कर देने वाला है. लेकिन भाषा भूषा और भाषण के आभूषणों से आच्छादित आडवाणी का भवितव्य बीते दिनों से ज्यादा भव्य और भला नहीं हो सकता कैसे कहा जा सकता है. सियासी सितारे कभी बुलंद नहीं होंगे, कहा नहीं जा सकता. आडवाणी के पास समय कम है फिर भी किसी भी अवसर पर आक्रांत नजर न आने वाले आडवाणी ने आगत के प्रति आश्वस्त रहने का मन बना लिया है.