भय, भूख और भेदभाव रहित समतामूलक समाज का सपना दिखाने वाली राजनैतिक पार्टियां जिस तरह भय पैदा करने, बदला भुनाने, धमकाने के लिए जुबानी जंग में लटपटॅ बयानबाजी के लट्ठ भांज रही हैं उससे यह चुनाव ऐतिहासिक बनता जा रहा है
इस बार का चुनाव ऐतिहासिक है. पहली बार नहीं है कि जन सेवक जन सेवा के लिए इतने इस कदर और इस हद तक उद्धत हों, वे हर रोज वे अपने मालिकों को धमाका रहे हैं कि इस बार सेवा का अवसर नहीं दिया तो अंजाम देख लेना, तुम्हारे रोजी रोजगार के जो कुछ दरवाजे खुले हैं वो बंद करने में देर नहीं लगेगी, दाना पानी मुहाल कर देंगे, यह पहली बार हो रहा है. ये जन सेवक हर कीमत पर अपने जन की, अपने मतदाताओं की सेवा करना चाहते हैं. उनकी सेवा भावना का यह उत्कर्ष अनुकरणीय है इसीलिए सभी पार्टियां इस मामले में एक दूसरे का होड़ करती हुई अनुकरणरत हैं. दरअसल असली मुसीबत यहीं है न सेवा करने में कोई पीछे रहना चहता है, न धमकाने में. मुलायम सिंह यादव बुलंदशहर में सरकारी स्कूलों में शिक्षक की नौकरी के उम्मीदवारों को धमका आते हैं कि वोट नहीं दिया तो योजना ठंडे बस्ते में चली जाएगी. जाहिर है कि अनुभवी मुलायम भले ही पुराने पहलवान रहे हों पर इतना तो जानते ही हैं कि अध्यापक समझदार प्राणी हैं, सभी टीचर तो ट्यूशन पर गुजारा नहीं कर सकते, फिर सरकारी नौकरी के आगे एक वोट की क्या हैसियत, नौकरी स्थाई है, चुनाव तो हर पांच बरस पर आते हैं, और सरकारें तो खैर आती जाती रहती हैं. शाश्वत सरकारी नौकरी पर नश्वर वोट का बलिदान कोई बड़ी बात नहीं, इसीलिए पढे लिखे समझदार शिक्षकों पर उनकी धमकी जरूर असर कर जाएगी. धमकी तो सपा के आजम खान भी देते हैं इनके धमकी देने का अंदाज थोड़ा न्यारा है और धमकी का फलक कुछ ज्यादा ही विस्तृत. ये धमकी ही नहीं देते भय भी पैदा करते हैं और भेद भी. यही हाल भाजपा के अमित शाह का भी है वे भी खुले आम धमकी देते हैं, एक पक्ष को आक्रांत तो दूसरे को भयाक्रांत करते हैं, दोनो का मकसद एक है, इस बार अगर उनकी पार्टी को थोक में वोट देकर नहीं जिताया तो अंजाम बुरा होगा. यह अलग बात है कि अगर जिता दिया तो एक दूसरे पक्ष को लगता है कि उसके बाद अंजाम शायद उनके लिए और बुरा न हो जाए. एनसीपी के अजित पवार महाराष्ट्रके जिस संसदीय क्षेत्र से उनकी उनकी बहन सुप्रिया सुले चुनाव लड़ रही हैं वहां के गांव वालों को एक रात धमका आते हैं कि अगर उनकी बहन को वोट न दिया तो पानी को तरस जाओगे. मीडिया पर हो हल्ला मचने पर अजित कहते हैं यह मैं नहीं था न मेरी आवाज पर देखने सुनने वाले यही कह रहे हैं कि यह अजीत की ही आवाज है और उनका इतिहास इस बारे में जो कहता है उससे उनसे इस तरह की उम्मीद की जा सकती है. भयादोहन या ब्लैकमेल के जरिए मताखेट वाला यह चुनाव वाकई ऐतिहासिक है. अब मुलायम सरीखे खांटी और पुराने नेता सीधी बात कहते हैं और लोगों की समझ में आ जाता है कि यह तो सरासर और सीधे सीधे धमकी हुई, पर प्रियंका गांधी सरीखी पढी लिखी, परिष्कृत महिलाएं ऐसा नहीं करतीं वे जनता को धमकाने के अनूठे और परोक्ष उपाय अपनाती हैं, बंदूक किसी और के हाथ होती है, नली विरोधी प्रत्याशी की ओर और निशाने पर आम वोटर. एक अतिउत्साही समर्थक कहता है कि वह राहुल के विरोधी प्रत्याशी को गोली मार देगा, प्रियंका उसे डांटने और उसके खिलाफ कोई कार्यवाई की बजाए जो कहती करती हैं उससे संकेत जाता है कि जनता समझदार है खुद ही समझ ले कि जो विरोधी पक्ष को मत देगा उसका पार्टी और उसके समर्थक क्या गत करेंगे. यही हाल नेशनल कांफ्रेंस के महावरिष्टह नेता फारूख अब्दुल्ला का है जो अपने निकटतम प्रतिद्वंदी को सीधे सीधे हमले और अंजाम भुगतने की धमकी देते हुए जनता को यह बताने की कोशिश करते हैं कि निजाम उनके हाथ है, उन्हें के हाथ रहे तो बेहतर. उधर देश की राजनीति को बदलने, लोकतंत्र को लोक के नजदीक पहुंचाने तथा भ्रष्टाचार के समूल नाश का प्रण लिए केजरीवाल धमकाते हैं, लोकतंत्र खतरे में है, इस बार उनको उनकी पार्टी को वोट नहीं दिया तो फिर भगवान अगली बार मौका नहीं देगा, भुगतते रहना भाजपा, कांग्रेस को बदल बदल कर. यह मतदाता में भय पैदा करने का अलग ही अंदाज है. भय भूख और भेदभाव रहित समतामूलक समाज का सपना दिखाने वाली राजनैतिक पार्टियां जिस तरह बदला भुनाने की बात कर रही हैं और जुबानी जंग में लटपटॅ बयानबाजी के लट्ठ भांज रही हैं उससे यह चुनाव ऐतिहासिक बनता जा रहा है. पहले पार्टियों के गुर्गे उनके इशारे पर बूथ कब्जा लेते या लूट लेते थे, जनता को वोट के लिए धमकाने की जरूरत ही नहीं थी, अब संभव नहीं. फर्जी वोट अब भी पड़ रहे हैं पर सीमित संख्या में, जनता को अपनी रैलियों में मनगढंत आंकडे, खुद का बनाया इतिहास- भूगोल और तरक्की की कहाँनियां बताना, पढाना अब आसान नहीं क्योंकि घर घर टीवी, इंटरनेट मोबाइल अखबार पहुंच गया है. जनता सूचना के इस महा विस्फोट और मीडियाई प्रभाव के साथ साथ शिक्षा के सामान्य प्रसार के चलते किंचित जागरूक है, वह किसी के द्वारा भ्रमित होने वाली नहीं अलबत्ता खुद अपनी शर्तों पर अपने आप भ्रमित होना उसे मंजूर है. सो बयानों भर से जनता को बरगलाना अब बेहद कठिन है उधर चुनाव आयोग ने चुनावी खर्चों पर लगाम कस रखी है. ऐसे में मतदताओं को लुभने के लिए साम दाम का रास्ता तो मुश्किल है ऐसे में महज दंड , भेद का ही सहारा है. धन नहीं दे सकते तो धमकी ही दे रहे हैं नेता. भाव नहीं दे पा रहे तो भेद ही उपजा रहे हैं. किसी न किसी विधि मत का मिलना होय. नेतृत्व की यह लाचारगी और नैतिक दिवालियापन वाकई ऐतिहासिक है. बिलबिलाए नेता बावले हो रहे हैं जो छात्र साल भर मेहनत नहीं करता वह परीक्षा के दिनों में परेशान और अधीर हो उठता है हताशा में अनुचित साधनों संसाधनों के जरिए इस वैतरणी के पार लगने पर भरोसा करने ही नहीं लगता उसका इस्तेमाल भी करता है. ज्यादातर नेताओं की गत यही है. पहले एक ही पार्टी तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार कह कर कुछ खास लोगों को ही और सीमित संख्या में जूते मारने की बात कहती थी अब चहुंओर से जूते बरस रहे हैं और लोग सौ सौ जूते खाएं तमाशा घुस के देखें वाले अंदाज में पूरे उत्साह और जोश खरोश से लोकतंत्र के इस महायज्ञ में भाग ले रहे हैं और समिधा स्वरूप अपने मतदान मतमशीन को अर्पित कर रहे हैं, बढ चढ कर धुंआधार मतदान कर रहे हैं, इस प्रत्याशा में कि इस बार तो बदलाव हो कर रहेगा. जनता जिस तरह सकारात्मक रुख लेकर अपने मत प्रयोग के लिए मतातुर है उसे देख समझ कर यही लगता है कि भले ही राजनैतिक दल और उसके अधिकांश नेता लोकतंत्र को रसातल में पहुंचाने की कोशिशों में जी जान लगा दें देश की इतनी उत्साही है कि अपने सदप्रयासों से आज नहीं कल उसे रसातल पहुंचने से पहले खींच लाएगी. इस महान आशावादिता के उदय के मायने में यह चुनाव ऐतिहासिक है. अंत में सबसे कमाल की और महत्वपूर्णॅ बात यह कि सारे नेता, सभी पार्टियां एक दूसरे को आश्वासन देती आ रहीं हैं कि वे जीते तो विरोधी, विपक्षी के खिलाफ दुर्भावना या बदले की भावना से कोई कार्यवाई नहीं होगी. वह चाहें मोदी हों या राहुल, मायावती हों या मुलायम. इस अमामले में सभी जन एक हैं. यानी अपने पूर्व धतकर्मों के लिए पश्चाताप या डरने की जरूरत नहीं तुम्हें मौका मिला तुमने किया, हमें मिल रहा है हम करेंगे. न हम तुम्हारी पोल खोलेंगे न तुम हामारी खोलना. सत्ता की ताकत का सदुपयोग सकारात्मक रूप से पनी प्रगति के लिए करना न कि नकारात्मक तौर पर दूसरे की जड़ें खोदने के लिए. यानी सारी सद्भावना, सहिष्णुता, राजनीति की कोख से जन्मीं सियासी बहनों सरीखी पार्टियों से प्रसूत इन विभिन्न दलों के नेता रूपी मौसेरे भाइयों के बीच और हर तरह की वितृष्णा, धमकी , भेदभाव जनता के नाम. वास्तव में यह चुनाव ऐतिहासिक है, शायद इसलिए भी कि अगर इसबार जनमत की अवहेलना हुई तो अगली बार जागरूक जनता इस चुनाव को इतिहास के कूड़ेदान में डाल देगी. संजय श्रीवास्तव