संजय श्रीवास्तव
टीवी पर एक विज्ञापन की पंक्तियां बड़े ठसके के साथ उभरती है. ‘’ अच्छे दिन आने वाले हैं, हम मोदी जी को लाने वाले हैं. ‘’ विज्ञापन खत्म होते ही ठीक दूसरे विज्ञापन में दबंग सलमान खान नजर आते हैं जो एक शीतल पेय के प्रचार की टैग़ लाइन अपने खास अंदाज में बोलते हैं,’’ एक तूफान खत्म हुआ तो दूसरा शुरू तूफान करो मेरी जान.’’ दोनो ही विज्ञापन हैं विज्ञापनों का सच से कितना वास्ता सबको पता है. पर यहां सवाल विज्ञापनी दावे के गलत होने का नहीं बल्कि सच होने का है. यह तो सच है कि भारतीय जनता के लिए चुनावी राजनीति का मतलब और फसाना अब तक यही रहा है,‘’एक धुंध से आना है और एक धुंध में जाना है’’ फिर एक तूफान के बाद दूसरा शुरू होने में शक कम ही है. हां तूफान की तासीर बदल सकती है. पर पहली और अव्वल बात कि क्या वाकई अच्छे दिन आने वाले हैं? अगर आने ही वाले हैं अच्छे दिन तो फिर सबके या हमेशा की तरह कुछ खास लोगों के या फिर किसके? मोदी जी को लाने, मोदी सरकार बनाने के बाद अच्छे दिन आने वाले हैं यह बात जितने आत्मविश्वास और दिल से रामविलास पसवान कह सकते हैं क्या उतनी ही साफगोई से राजनाथ भी अपने बारे में कह सकते हैं. यह तय हो सकता है कि सतपाल महाराज के दिन बहुरें पर क्या मुरली मनोहर जोशी के दिन नहीं बिगडेंगे. जेतली, अमित शाह के लिए जितने अच्छे दिनों की कल्पना की जा रही है क्या सुषमा और आडवाणी भी उसी तरह के सुनहरे दिनों के ख्वाब बुन पाएंगे. एक बार किसी तरह से उबरी उमा के दिन स्थिर रहेंगे? जो दिन एमजे अकबर और बलबीर पुंज के बदलेंगे क्या वैसे ही दिन क्या कुछ कांग्रेसी जर्नलिस्टस के भी होंगे, पार्टी पट्टाधारी पत्रकारों, कलमकारों का जो भी हो आज़ाद कलमकारों के दिन कैसे होंगे वह हमेशा की तरह आशंकाग्रस्त ही रहेगा या कि बदलेगा? संघ समर्थित अथवा कुछ दक्षिणपंथी सोच विचार वाले सामाजिक कार्यकर्ता, थिंक टैंको के लिए जो अच्छे दिन आने वाले वाले है क्या वैसे ही दिन तीस्ता सीतल्वाड या अरूंधती राय या रामचंद्र गुहा जैसे कईयों के लिए भी होंगे? रामदेव को भले लगे कि अब अच्छे और राहत भरे दिन आने वाले हैं, पर काग्रेसी संतों, शंकराचार्य और मठाधीशों से जरा उनके दिल का हाल पूछिए? सपाइयों, बसपाइयों को छोड़ दें तो इस अच्छे दिन की आशंका से बेहद डरे हुए अल्पसंख्यकों में से बहुसंख्यकों की क्या राय है किसी ने जानने की कोशिश की है? निराशावादी बनना अच्छी बात नहीं, हो सकता है मोदी मंत्र कुछ काम कर जाए और एक बेहद अकर्मण्य सरकार के जाने के बाद कुछ बेहतरी दिखे और अच्छे दिन आने के संकेत मिलें पर क्या गैर भाजपाई इसे स्वीकारेंगे? जब तक वे सत्ता में न हों या सत्ता के सहयोगी न बनें उनके लिए अच्छे दिनों का कोई अर्थ नहीं. यह हाल इन पार्टियों के नेताओं का ही नहीं उनके लाखों की संख्या में फैले समर्थकों का भी है आखिर दिल्ली के दस साल के विकास से भाजपा नेता सहमत नहीं थे तो क्या कोई भाजपा समर्थक यह कहता मिलता था कि हां तमाम सड़्कें, सुविधाजनक बसें, ओबरब्रिज और मेट्रो शीला सरकार की देन है. या फिर गुजरात का कोई कांग्रेसी समर्थक स्वीकारेगा कि वहां धुंआधार विकास हुआ है. जाहिर है ऐसे लाखों लोगों के लिए जो भाजपाई नहीं है उनके लिए अच्छे दिन आ कर भी नहीं आने वाले हैं. अब यह जाहिर है मोदी के सत्तासीन होने के बाद भाजपा और उसके नेता लाख यह दावा करते फिरें कि देखिए बस अच्छे दिन आने वाले हैं या आ ही गए हैं, भले यह सियासी सच भर हो और सत्यता से इनका दूर दूर तक कुछ भी लेना न हो पर वे दलगत मजबूरी या मोदी भय से यह दुहराएंगे, उसके साथी दल हां में हां मिलाएंगे, कोरस गाएंगे. हो सकता है दूसरे दलों से गए मौकापरस्त और अब उपेक्षित तथा इनके अलावा असंतुष्ट भाजपाईयों को भी दिखने लगे कि अच्छे दिन तो आए नहीं. अब इसमें मोदी का क्या दोष? जो काम बासठ साल में कांग्रेस नहीं कर पाई और उस काम को मोदी तुरंत कर गुजरें यह कहां संभव है पर इस हो हल्ले से यह तो साबित हो ही जाएगा कि सबके दिन अच्छे नहीं. मान के चलिए कि फिलहाल इतनी जल्दी अच्छे दिन उनके भी नहीं आने वाले जो पीढियों से बेहद गरीब हैं, अशिक्षित , भूखे, बेकार, बीमार, लाचार हैं. दो एक दशक का ईमानदार और सही दिशा में प्रयास ही इनके अच्छे दिन ला सकता है और जो बेहद अमीर हैं उनके अच्छे दिन मोदी के आने से बुरे नहीं होने वाले उनको इस नारे से कोई मतलब नहीं. हां एक बड़ा मध्यम मध्यम वर्गीय तबका इसकी बाट जोह सकता है यह अलग बात है कि वह हर बात में मीन मेख निकालने वाला होता है. नकारता ज्यादा है, स्वीकारता कम है. यह बड़ी मुश्किलों के बाद ही स्वीकारेगा कि अच्छे दिन आ गए हैं. आटा सस्ता हो गया पर गैस तेल तो वहीं पर हैं, काश मोदी ने गैस कीमतों पर....... तो क्या अच्छे दिन आखिर किसके आने वाले हैं. मोदी विरोधियों और कुछ नकारात्मक सोच वालों की मानें तो मोदी और कुछ उनके अंध समर्थकों तथा अवसरवादियों के. विकास की गुलाबी तस्वीर तैयार करेने वाले आंकडेबाजों के, जतियों धर्मों के नाम पर साजिश कर विद्वेष फैलाने वालों के, धर्म - संस्कृति के स्वयंभू ठेकेदारों के, जमाखोरों काला बजारियों के, शहरी कारोबारियों के, किसानों का शोषण करने वाले आढतियों बिचौलियों के, मीडिया और तकनीकि का सहारा लेकर सियासी बगूला तैयार कर सकने में समर्थ बाजीगरों के या फिर अरबों खर्च कर चुनावी लीग खिलवाने वाले दिग्गज कारपोरेट्स के. भले ही बात पूरी तरह सच न हों पर इनकी बात में दम तो लगता है. तो क्या बस मुट्ठी भर इन्ही लोगों के लिए अच्छे दिन आने वाले हैं.? चुनावों से ठीक पहले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने एक उद्बोधन में हमेशा की तरह बड़ी गंभीरता से कहा था ‘ अच्छे दिन वाले हैं” राष्ट्रीय पटल पर उभरे मोदी ने उस वाक्य पर चुटकी लेते हुए मजाकिया लहजे में कहा था,: हां प्रधानमंत्री जी सही फरमा रहे हैं, अच्छे दिन आने वाले हैं, बस चुनाव होने तक इंतज़ार कीजिए. यह बात शुरुआती तौर पर तंज करते हुए मजाक में कही गई थी पर जैसा कि कांग्रेस से लेकर भाजपा तक सभी पार्टियों में चलन है नेता के मुख से निकला सब कुछ सुभाषित ही होता है, मोदी के मुखारबिंद से निकला यह वाक्य ब्रह्मवाक्य ही नही नारा बन गया. अब आशंका इस बात की है कि मजाक से जनमा यह सूत्रवाक्य आने वाले समय में कहीं देश के लिए गंभीर मजाक न बन जाए और लोग इसे नमक की तरह न इस्तेमाल करें, नाकाम, बदहाल, बेकार लोगों का उपहास उड़ाते हुए लोग यह कहते हुए न सुने जाएं कि तुम्हीं तो रटते फिरते थे अच्छे दिन आने वाले हैं. सत्तासीन होने के बाद कभी गरीब चाय बेचने वाले मोदी को किसी का ख्याल रहे न रहे पर इन गरीबों, बेकारों बदहालों और हाशिए पर पड़े लोगों का ख्याल जरूर करना होगा. इनके अच्छे दिन न भी आएं तो कोई खास बात नहीं, वे किसी भी सरकार में नहीं आए पर दिन और बिगड़ने न पाएं यही बहुत होगा.