संजय श्रीवास्तव
चुनावी चरणों के चलते उतारचढाव ने दलों और दलपतियों को में तमाम तरह की आशंकाएं बो दी हैं. सभी अपने अपने स्तर पर आशंकित हैं या असमंजस में, उनकी यह हताशा इस अखिरी दौर के उनके बात व्यवहार से साफ जाहिर हो रही है चुनावी चरण अब मंजिल की ओर बढ चले हैं, बस कुछ ही दौर बाकी हैं. मतदान के दौर खत्म होने से ठीक पहले का यह मंजर है कि हर दल आशंकित नजर आता है, हताशा चहुंओर है कहीं कम कहीं ज्यादा. यह देखते समझते कई बदहवास हैं तो कितने ही बदजुबानियों पर उतर आए हैं. चुनाव आयोग की लंबी चुनाव प्रक्रिया ने हमारे अधैर्यशील नेताओं के धैर्य की बड़ी कठिन परीक्षा ली है, चुनाव में तो कोई एक पास हो जाएगा पर अंकगणित सबकी गड़बड़ाई हुई है और कोई भी आश्वस्त नहीं दिखता. मीडियाई सर्वेक्षणों के अनुसार स्पष्ट बहुमत के साथ मोदी सरकार बनाने की आश्वस्ति हासिल कर चुकी भाजपा हो या बड़े ठसके के साथ उससे अलग हुआ जद यू. सबसे पुरानी और सर्वाधिक अनुभवी नेतओं से भरी कांग्रेस. सपा, बसपा हो या वामपंथी, तीसरे मोर्चे के अन्य घटक दल अथवा तृणमूल कांग्रेस. चुनावी चक्रों के बीते दौर से हमारे अनुभवी और चतुर नेता बूझ चुके हैं और अनुमान लगा चुके हैं कि इस चुनावी ऊंट की कौन सी कल सीधी होगी, यह किस करवटॅ बैठेगा, भले ही यह उनका अनुमान ही हो और नतीजे इससे अलग हों पर उनका व्यवहार बताता है कि वे सीट सीटॅ और राजनीति के घाट घाट का पानी पीने के बाद क्या सोच समझ रहे हैं. यह सोच समझ हताशा निराशा, बदहवासी पार्टी स्तर पर भी परिलक्षित हो रही है तो व्यक्तिगत स्तर पर भी. मीडिया के जरिए रात दिन जनता यह देख पढ समझ रही है. उसे भी इसके आधार पर आगत का अनुमान लगाने का मौका मिल गया है.वह तमाम दलों की बेचैनी और चढते उतरते पारे को खूब देख समझ रही है. कांग्रेस हताश है. उसके अगुवा राहुल कहते हैं, अगर पर्याप्त सीटें नहीं आईं तो विपक्ष में बैठेंगे किसी को समर्थन नहीं देंगे. यानी कि आगत की आहट उनको अभी से है. कांग्रेस बीच चुनाव में पूरक घोषणा पत्र जारी करती है और पिछ्ड़े मुसलमानों को आरक्षण की घोषणा करती है यो यह बस जमीन बचाने और हारते हारते कुछ और हासिल कर लेने की हताशापूर्ण कवायद से ज्यादा क्या है, जाहिर है दस साल में किए गए यूपीए के काम और चुनाव के ठीक पहले जारी अपने घोषणा पत्र पर उसको पूरा यकीन नहीं है कि इसके आधार पर उसको काम भर के वोट मिल पाएंगे. वह अचानक ही चार सौ से भी ज्यादा भाजपाई घोटालों के बाहर लाती है, मोदी के खिलाफ व्यक्तिगत हमले ही तेज नहीं करती, मोदी पर एफआईआर से उसे संतोष नहीं होता. अनन फानन महिला जासूसी कांड की जांच के लिए अवकाशप्राप्त न्यायधीश तलशने में जुट जाती है. अमेठी में विकस की कमी राज्य सरकार पर थोपती है और उसके नेता बदहवसी में ऊलजलूल बयान पर उतर आते हैं ऐसे बयान जो एक समय विशेष पर तो खास मायने रखते पर इस समय वह बदहवासी से उपजे बयान ही माने जाएंगे वह चाहे सिब्बल बोलें या अय्यर अथवा चिदम्बरम और यहां तक कि राहुल ही क्यों न हों. उत्तर प्रदेश और बिहार की 120 से ज्यादा सीटें किसी भी आम चुनाव में बहुत असर रखती है. बिहार में नीतीश कुमार की निराशा टीवी के पर्दे पर साफ झलकती है. वे कहते हैं कि वे चुनाव जीत हार के लिए नहीं महान उद्देश्य और बेहतर सरोकार को लेकर लड़ रहे हैं. कांग्रेस के खिलाफ बुरी तरह आक्रोश है अगर भाजपा साथ होती तो भारी मात्रा में भुनाते मगर अब भाजपा रही कहां वहां तो महज मोदी जपा ही है. खैर, सभी पार्टियां महान उद्देश्य और उच्चतम सरोकारों के नाम पर ही चुनाव लड़ती हैं और जीत की अपेक्षा रखती हैं. नीतीश इस बात से हताश हैं कि जातीय समीकरण का खेल का तीर उनके पिछ्ले जीतों को तुक्का न साबित कर दे. सारे देश में विकास के नाम लड़े जा रहे चुनाव में बिहार का विकास पुरुष कहीं का न रहे. जात और भात दोनो गंवा चुके नीतीश के तेवरों से साफ है कि उनका तीर निशाने पर नहीं लग रहा. सर्वेक्षणों के अनुसार बिहार में नितीश तीसरे स्थान पर हैं अब भाजपा उसके साथी तथा राजद कांग्रेस से जो कुछ बचेगा उसी से उन्हें संतोष करना पड़ेगा. उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव सक्रिय राजनीति के संभवत: इस अखीरी दौर में जिस कदर बयान दे रहे हैं उससे साफ लग रहा है कि या तो वे शरीर और दिमाग से थक गये हैं या फिर नतीजे उनके उम्मीद से बहुत ज्यादा अलग आने वाले हैं, मायावती पर दिए गए बयान, बलात्कारियों के खिलाफ सख्ती से परहेज या मुस्लिम तुष्टीकरण की चालों से कुछ बातें साफ हैं. एक तो वे प्रदेश में भाजपा के बढते प्रभाव और उसकी आने वाली संभावित सीटों की संख्या से आतंकित हैं दूसरे केंद्र में आ सकने वाली सरकार की आशंका से भी, उधर बसपा बिना कोई शोर मचाए अगर नंबर दो पर रहती है तो सपा के लिए अगले विधान सभा चुनाव के बाद का बनवास कितना लंबा होगा कौन जाने. इस हताशा का असर उनकी जुबान से दिखता है. मायावती भी कम हताश नहीं हैं सपा को तो भले ही किसी भी अर्थों में कोई पूछ भी रहा है बसपा का तो उनके कोर वोटर और कत्र समर्थकों के अलावा कोई नामलेवा ही नहीं है इस बार . उधर ममता भी कुछ ज्यादा उत्साहित नहीं हैं, भले ही ऐसा लगता है जैसे भाजपा ने खुले आम आमंत्रण दे कर उनका भाव बढया हो पर दर असल यह उनको एक्सपोज करने की चाल है, हतोत्साहित करने वाला सियासी कदम यह वह बखूबी जानती है. ममता एंटी एकैंबेंसी फैक्टर से आशंकित हैं तो थोड़ी बहुत मोदी की ललकार से भी. मामता इस लिए भी थोड़ी बदहवासी में हैं कि दो हफे से भी कम समय में परिणाम समने आने वाला है पर जाना किधर है यह अभी भी तय नहीं. इस चुनाव को सबसे बेहतर प्रबंध शैली, शानदार, लागत और तकनीकि तथा सूचना तंत्र के भरपूर उपयोग में कांग्रेस को कोसों पीछे छोड़ देने वाली भाजपा मे हर ओर सत्साहस है, वह जोश और सुनहरे भविषय के सपने तथा उम्मीदों से लबरेज है, ऐसा भी नहीं है. यहां हताशा दूसरों से थोड़ी कम हो पर चुनाव के आखीरी चरणों तक पहुंचते पहुंचते पार्टी स्तर पर और व्यक्तिगत तौर पर दोनो ही मामले में निराशा, हताशा साफ दिखने लगी है. मतदान के पहले दूसरे दौर तक सर्वेक्षणों ने यह घोषित कर दिया कि भाजपा को पूर्ण बहुमत मिल रहा है पर अब कई दिग्गज भजपाई भी स्वीकारते हैं कि बिहार में संघर्ष द्विपक्षीय है, दूसरा पक्ष राजद और साथी कांग्रेस गठबंधन है. भाजपा को न तो बिहार में उसको पूर्वापेक्षित सीटें मिलने जा रही हैं न ही उत्तर प्रदेश में, दक्षिण में भी जो अनुमान था उससे कम ही मिल रही हैं. आकलन से बहुत ज्यादा कमे हुई तो मोदी के नाम पर साथी ढूंढने मुश्किल होंगे और समझौता करना सब किए पर पानी फिरने जैसा. मोदी का मतदान के बाद प्रेस कांफ्रेंस और कमल निशान दिखाना इसी हताशा से उपजा कृत्य था. अंतिम दौर में भजपा का बेहद आक्रामक हो जाना और सारी ताकत झोंकना इस आकलन को सही बताता है कि भाजपा को मनोवांछित संख्या नहीं मिलने जा रही.मुस्लिम मतों का ध्रुवी करणॅ और सवर्णों को एकमत करने की दो पाटों की राजनीति का नतीजे क्या निकलेगा अब आखिरी दौर में इस पर उसे सोचना पड़ रहा है.उधर भाजपा को वोट देना खुदा, लौम और देश से गद्दारी है जैसे अपने बयानों से केजरी की हताशा साफ झलकती है. भाजपा में तो पार्टी स्तर के अलावा व्यक्तिगत स्तर पर भी हताशा साफ झलकते है. राजनाथ सिंह का यह दुहराता हुआ बयान कि हर हाल में मोदी प्रधान मंत्री होंगे, मैं सरकार में शामिल नहीं रहूंगा, सत्ता के दो ध्रुव नहीं बनेंगे यह बातें उनके प्रधानमंत्री बनने के ख्वाबों और सियासी तिकड़मों के जग जाहिर होने के बाद हास्यास्पद तौर पर उनकी व्यतिगत निराशा की नुमाईंदगी करता है. उधर उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी के बयान भी बताते हैं कि वे सहज नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर देखा जाए तो बस एक ही शख्स है जो तटस्थ है और न हताश है न निराश, शायद उसने कोई आशा पाल ही न रखी हो , वह हैं हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह. लगता है इस चुनाव बाद वह अंतरतम में यह बुदबुदाते हुए मिलें,’ भला भया पीएम पद गया, जां से छूटी बलाय, जने जने का रूठना मो सो सहा न जाए’.