संजय श्रीवास्तव



चुनावी परिणाम क्या होंगे इस पर अटकलों के लिए कल भर है. भूत हुए चुनावों के भविष्य पर चर्चा अत्यंत आवश्यक है.




इतना तय मान लिया गया है कि वर्तमान सरकार जाएगी, एनडीए बड़ी ताकत बन कर उभरेगी. बदलाव अवश्यंभावी है, जनता ने इसी के लिए वोट दिए हैं और राहुल से लेकर रामदेव तक मोदी से लेकर मायावती तक सभी बदलाव की ही बात कर रहे हैं. कोई कुछ भी अक्षुण्ण बनाए रखने की बात नहीं कर रहा. सबके अपने अपने अपने ब्रांड के बदलाव हैं. 1952 से लेकर आज तक हर चुनाव में हमारे नेता बदलाव की बात करते हैं उसके दावों पर चुनाव लड़ते हैं, हर बार जो वह बदलाव लाना चाहते हैं वह भी बदल जाता है पर बदलाव का नारा है कि बदलता ही नहीं. इस बार भी बदलाव होगा. कांग्रेस और भाजपा पार्टी स्तर पर बदलेंगी, कुछ नेताओं के दिन बदलेंगे, सरकार बदलेगी, सरकार और सरकार में चेहरे बदलेंगे, चाल भी बदलेगी पर क्या सत्ता का मूल चरित्र भी बदलेगा? प्रशासन और आम जन का जीवन बदलेगा ? आने वाले नतीजों और उनसे उपजने वाले बदलावों पर बहस बाद की है सबसे पहले बदलाव के मूल कारक चुनाव पर चर्चा होना ज़रूरी है. इसके लिए भी बस आज ही बचा है. क्योंकि उसके बाद अगले चुनावों तक किसे समय है.
लोकतंत्र में मात्र चुनाव ही एक जरिया है जिससे सार्थक बदलाव लाया जा सकता है और अगर चुनाव के तौर तरीके, मतलब ही बदल जाएं तो जाहिर है पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था का अर्थ बदल जाएगा. इस बार का चुनाव पिछले कई चुनावों से बहुतेरे मामलों में अलग रहा. पहली बार बहुमत किसी पार्टी को दिलाने और सरकार व्यक्ति विशेष की बनाने की अपील की गई. चुनाव परिणामों पर असर डालने और चुनावी खर्च बेतहाशा बढा देने वाली इतना लंबी चुनावी प्रक्रिया भी देश ने पहली बार देखी भले ही उम्मीदवारों पर 70 लाख तक के खर्च का अंकुश पर चुनावी खर्च के मामले में पार्टियों का शर्मनाक तरीके से बेलगाम को भीषण खर्चना पहली बार दिखा. मीडिया और तकनीकि मिल कर कैसे गढते हैं भ्रमजाल, सशक्त तरीके से सामने आया.यह भी पहली बार दिखा कि दल विशेष की रैली में आईटी विशेषज्ञों की एक भरी पूरी टीम लैपटॉप, कैमरों, स्मार्ट फोन और इंटरनेट तथा दूसरे सरंजामों से लैस हो बाकायदा डेस्क बना कर उपस्थित हों और लाइव ट्रेंड, ट्वीटॅ किए जा रहे हों. साईबरी सेना का जनमत प्रभावित करने हेतु ऐसा सम्यक प्रयोग इतने बड़े स्तर पर दिखना नई परिघटॅना थी, यहां तक कि पोर्न साइटों पर भी पार्टी विशेष के पोस्टर जगमगा रहे थे.
चुनाव को एक ईवेंट के रूप में मैंनेज करना और अपने प्रबंधकीय कौशल से उस तमाशे को गंभीर बनाए रखने की कवायद भी पहली बार दिखी. खास तरह के कैमरे से सैकडों की भीड़ को जन सैलाब बना कर पेश करने और अपनी रैलियों, नेता के भाषण का फुटेज मीडिया को खुद मुहैया का कराने का प्रचलन और मीडिया द्वारा ऐसी सामग्री का आंखमूंद कर प्रकाशन प्रसारण भी पहली बार देखा गया.बेलगाम सोशल मीडिया पर अतिशय आक्रामक प्रचार और पार्टियों द्वारा उसका इस कदर व्यापक रणनीतिक इस्तेमाल पहली बार इस पैमाने पर हुआ. कारपोरेटॅ, थैलीशाहों के बिना लोकतंत्र चार दिन नहीं चल सकता हर चुनाव में इनकी भूमिका रहती है पर संकेत मिले कि वह भविष्य में मुखर, प्रखरऔर नग्न भूमिका में दिखेगा. लंबी चुनाव प्रक्रिया के चलते तहत हर दौर पर समीकरण बनते बिगड़ते दिखे और नेताओं ने कभी जानबूझ कर, कभी रणनीतिक तौर पर तो कभी बौखलाहट में विवादास्पद बयान दिए. चुनावी बहस का स्तर गिरा और चुनाव आयोग इस बार महज कागजी शेर बना रहा. शेषन से पहले का जमाना उनके जाने के इतनी साल बाद पहली बार दिखा.
देश में इस बार औसतन 10 प्रतिशत से 20 फीसदी तक मतदान बढ़ा है. इससे पहले का रिकार्ड महज 7 फीसदी का था. यहां तक कि ग्रेट निकोबार में रहने वाले पाषाण युग की अंतिम जीवित प्रजाति शोंपेन आदिवासियों के 60 सदस्यों ने भी वोट डाले. पहली बार कुल मतदाताओं के 20 फीसदी मतदाता युवा थे. युवा मतदान , ज्यादा मतदान लोकतंत्र की सेहत का सुखद संकेत है पर इसका कोई सीधा गणित नहीं है, इसके ठोस मायने निकालना निरर्थक है, कई उदाहरणॅ यह साबित करते हैं. यह देखना आवश्यक है कि आखिर ये संख्या क्यों बढी? दलों की बहुकोणीय मुकाबले, जाति , धर्म, संप्रदाय, अंधानुकरण और खेमेबंदी का आक्रमक प्रभाव जैसे इसके कई नकारात्मक कारण हो सकते हैं. युवा मतदाताओं की वजह से बढे मतदान कितना सकारात्मक और गुणॅवत्तापूर्णॅ है कहा नहीं जा सकता दुर्भाग्य से हमारे युवाओं को राजनीति से दूर कर दिया गया है और उसी का नतीजा है कि सर्वेक्षणॅ साबित करते हैं कि उनकी राजनैतिक परिपक्वता स्पष्ट रूप से संदिग्ध है. यह जरूर है कि मतदान शांतिपूर्ण हुए पर साथ ही यह बात एक बार फिर खुल कर सामने आई कि हमारी पुलिस किस कदर अप्रशिक्षित और गैर पेशेवर तथा निष्पक्षता से परे और नाकारा मानी जाती है कि महज 1,20,000 सुरक्षा बलों बल पर चुनाव कराने के चलते इतनी लंबी और खर्चीली चुनाव प्रक्रिया झेलनी पड़ती है.
1952 के चुनाव साढ़े दस करोड़ रुपए ख़र्च हुए थे जबकि 2014 में चुनाव आयोग लगभग 7,000 करोड़ रुपए ख़र्च कर चुका है. सभी दलों का तब सामूहिक खर्च तकरीबन 400 करोड़ था. अब तो एक पार्टी ही इससे कहीं ज्यादा खर्च कर चुकी है, कुल ख़र्च तो 40,000 करोड़ रुपए से अधिक ही बैठेगा. आखिर ये पैसा पार्टियां कहां से ला रही हैं, जो सरकार में हैं वे भ्रष्टाचार से, जो नहीं हैं ? यह पैसा किसका है. जाहिर है किसी पैसे वाले का. क्या वह यह पैसा राष्ट्र प्रेम में समर्पित कर रहा है या कीमत भी वसूलेगा. निस्संदेह पैसा व्यवसाय से आया है तो व्यवसायी कीमत क्यों न वसूलेगा.
पहली बार इस बात के साफ संकेत दिखे कि आगे से चुनाव पार्टियों के हाथ में नहीं रहेंगे. पार्टियां महज चुनाव आयोग से वास्ता रखेंगी और सारा काम इवेंट मैंनेज करने वाले और दिग्गज कॉरपोरेट के कॉरटेल करेंगे. हां मीडिया तथा जनता में चेहरा दिखाने और अपने दाता के सहयोग के लिए कुछ खास नेता रहेंगे. यह पूरा खेल प्रायोजित होगा. नेता अपने प्रायोजक का महज मोहरा होगा, पार्टी उसके वहां गिरवी. कार्यकर्ता इवेंट मैंनेजरों की सहायता करने, नारा लगाने, भीड़ बढाने, और झंडा ढोने के लिए होगा. जनता की भागीदारी महज टीवी, इंटरनेट और चौराहों पर थ्रीडी प्रचार देखने और नियत तिथि पर वोट देने की होगी, हो सकता है कि बूथ तक जाने की जहमत केवल सूदूर क्षेत्र के लोग ही उठाएं, घर बैठे मतदान की सुविधा दे दी जाए. चंद लोगों का समूह जो इस दंगल में अपनी अपनी प्रयोजित पार्टियों के पहलवानों को उतारेंगे वे जीत हार के बाद अपने पैसे दोगुने चौगुने कर के सरकार से वसूल लेंगे.
अब कल चुनाव परिणाम जो भी आएं, सरकार किसी की भी बने पर सबसे पहली चिंता लोकतंत्र की इस गंगोत्री की सफाई की होनी चाहिए. इसमे संदूषणॅ का अर्थ है दूषित जनमत. एक अवैध सरकार जिसके सरोकार जनता की बजाए किसी और से जुड़े हैं और वह परोक्ष रूप से उसी के लिए जवाबदेह और जिम्मेदार है. वह चुनी तो जनता द्वारा जाती है पर वे जनसेवक नहीं हैं. उसकी मालिक जनता नहीं, उनके आका थैलीशाह हैं वे उन्हीं के मतलब के कानून बनाती है, नियामक तय करती है. ऐसा अभी भी हो रहा है पर खुले आम नहीं पर तब खुले आम होगा. हो सकता है कि यह तथ्य किंचित आवर्धित, अतिरेकी लगे और समय से पहले भी, पर देश के चुनाव इस ओर जा रहे हैं भविष्य में इससे इनकार करना मुश्किल होगा सो इस चिंता पर चिंतन और चर्चा को देना हर लिहाज से वाजिब होगा. परिणामों पर बहस के लिए तो पूरा पखवारा पड़ा है.