मोदी सरकार को यह साबित करने में भले ही अभी देर लगे कि वास्तव में अच्छे दिन आ गए हैं पर इस जनादेश का निरपेक्ष विश्लेषण बड़ी साफगोई से यह साबित करता है कि अच्छे दिन आ रहे हैं...

मतगणना के ठीक बाद नरेंद्र मोदी ने एक सभा में लोगों की तरफ नारा उछाला, अच्छे दिन....... अच्छे दिन ..... जवाब में जन समूह का घोष था, आ गए..... आ गए.... . अब कुछ नकारात्मक सोच वाले लोग और कट्टर भाजपा विरोधी भले इसे कोरा नारा और सियासी भुलावा अथवा मजाक समझें पर संसार भर में खुशफहमी के मामले में काफी ऊंचा स्थान हासिल करने वाला यह उत्सवधर्मी देश इतना नकारात्मक कभी नहीं रहा, सकारात्मकता और आशावादिता इसकी संस्कृति और यहां के लोगों के खून में है, सो महज भाजपाईयों को ही नहीं अधिसंख्य जनता को भी यही लगता है कि अच्छे दिन आ चले हैं. अच्छे दिन आ गए हैं यह बात मोदी का काम काज जब साबित करेगा तब करेगा, उनकी सरकार यह यह साबित कर पाए या नहीं कि वास्तव में अच्छे दिन आ गए हैं पर जनता ने अपने जनादेश के जरिए जरूर साबित कर दिया है कि मोदी समेत देश के अच्छे दिन आ गए हैं. सरकार बनने और उसके हनीमून पीरियड के गुजरने, कामकाज शुरू करने फिर उसके काम काज के फलित सामने आने में अभी बहुत देर है, मगर जनादेश तो ठीक सामने हैं और इसका निरपेक्ष विश्लेषण किया जाए तो इसके साफ संकेत हैं, अच्छे दिन आ गए हैं.
जनदेश का पहला संकेत- अच्छे दिन लाने के लिए देश को चाहिए एक सशक्त, मुखर और सक्रिय नेतृत्व. इंदिर गांधी के बाद देश आंशिक तौर पर अटल बिहारी वाजपेयी को छोड कर राष्ट्रीय पटल पर नेतृत्व का अभाव देश लगातार महसूस करता रहा है. मोदी के रूप में देश को लीडर दिखा और जनत ने उसे चुन लिया. मोदी की बुराई करने वाले उन्हें लाख बुरा कहते रहें पर जहां तक एक दमदार लीडर की छवि है उस मुकाबले में देश के अधिकांश नेता शून्य हैं या कुछ नेता गणॅ भले थोड़े जनप्रिय हों अथवा बेहतर रणनीतिकार, सफल राजनेता हों या शराफत और ईमानदारी के कथित पुतले पर कुल मिला कर नायक की जो छवि मोदी की है वे उसके आसपास तक नहीं पहुंचते. सो जनादेश ने साफ कर दिया है कि जनता अंधेरे में नहीं रहने वाली कि पार्टी अपनी सुविधा के अनुसार किसी भी आज्ञाकारी को प्रधानमंत्री बना दे भले ही उसमें नेतृत्व क्षमता हो या न हो. फैसला पार्टी लेती है पर नीतियों को लागू करने का काम तो प्रधानमंत्री और उसके मंत्रिमंडल का होता है. प्रधानमंत्री सरकार की सारी बातों के लिए जिम्मेदार एक चेहरा होता है और जनता को पता रहना चाहिए कि वह चेहरा या व्यक्ति कौन है जो इस जनादेश के प्रति जवाबदेह होगा क्योंकि सामूहिक जिम्मेदारी का मतलब कोई जिम्मेदार नहीं. सो वास्तविक जनप्रिय नेता, जमीनी नेतृत्व को तरजीह देने वाले राजनीति के अच्छे दिन आने वाले हैं.

इस जनादेश ने देश में उम्मीदों के बीज बोए हैं. अब अगर ये बीज ठीक से नहीं जनमे, पनपे, सुफल न दे सके तो जनता इससे भी जबर्दस्त पाटा चला कर फिर नए किस्म के बीज बोने की कला जान गई है


तो अब इस मुगालते से भी मुक्ति पा लेनी चाहिए कि यह जीत किसी पार्टी की है. भजपाई नेता भले ही सामने इतरा लें पर परोक्ष तौर पर जानते हैं कि यह जीत मोदी की है. भाजपा को पता है कि पूर्व अध्यक्ष गडकरी, वर्तमानअध्यक्ष राजनाथ सिंह, चुनाव हारने वाले अरुण जेतली, जीतने वाली सुषमा स्वराज यहां तक कि अपने मार्ग दर्शक आडवाणी तक को आगे करके चुनाव लड़ते तो भले ही कॉंग्रेस हार जाती पर इस तरह की सफलता कतई नहीं मिलती. पार्टी के साथ ही राजनैतिक विचारधारा को भी जनता ने रास्ता दिखा दिया है. मोदी की जीत को एकबारगी हिंदुत्ववादी या दक्षिणपंथी अपनी जीत समझ लें पर यह उनकी शतप्रतिशत खुशफहमी ही होगी. वामपंथ हाशिए से भी दूर सिमटता जा रहा है तो समूचे देश में पहुंच रखने वाले मध्यम मार्गी बुरी तरह धूल चाटते, सिमटते जा रहे हैं. गैर कंग्रेस, गैर भाजपा, वाम और समाजवाद भी नहीं का अलग तरह की भ्रष्टाचार विरोधी जनोन्मुख राजनीति की विचारधारा का उदय हुआ पर फिलहाल जनता का रुख धारा में दिखता है, विचार में नहीं. इतना ही नहीं सो यह जनादेश अपनी राजनीतिक विचारधारा के जंजाल में फांसने वालों को सतर्क होने की बात कहता है, शायद दक्षिणपंथी यह बात एक दो दशक बाद समझेंगे. तो, जाहिर है अछे दिन आने वाले हैं क्यों कि इसके साथ सातह ही जनादेश के ट्रेंड से लगता है कि गढबंधन की मजबूरियां गिना , दोष दूसरों पर थोप कर जिम्मेदारियों से बच निकलने के राजनीतिक धूर्तता के दिन भी गए.
यह जनादेश धर्म, जाति, क्षेत्र और गांव शहर के दायरों से आंशिक तौर पर ही सही पर इससे उठने के संकेत देता है. यह संकेत आगे चल कर और बड़ा होगा क्यों कि इस बार के युवा मतदाता अगली बार और बढेंगे, तादाद, उम्र, अनुभव हर तरीके से. यह अंतिम मौका था यह समझने के लिए कि यदि नेतृत्व को ले कर असमंजस की स्थिति न रहे तो सारे मुस्लिम वोट एक जुट हो कर भी कोई बड़ा प्रभाव नहीं डाल सकते न हिंदुत्ववादी ध्रुवीकरण से जनादेश पर बहुत फर्क पड़ने वाला. दलितों, पिछड़ों अल्पसंखयों और इसी तरह के वोट बैंक के सौदागरों का हश्र सबके सामने है, प्रदेश में सत्ता रहने के चलते सपा अपने कुनबे की सीट बचा पाया तो बसपा साफ ही हो गई. क्षेत्रीय क्षत्रपों में अगर ममता, जयललिता और नवीन पटनायक को सफलता मिली है तो यह उनकी अपनी छवि के चलते वरना क्षेत्रवाद को जनता ने बुरी तरह नकारा. इस जनादेश में शहर गांवों जिस तरह समान रूप से एकमत दिखा उससे लगता है कि गांवों तक राजनीतिक जागरूकता धर्म, जाति क्षेत्रीयता के नाम बर बंटॅवारे की राजनीति के प्रति अरुचि दिखने के अच्छे दिन आने वाले हैं.

भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जनता जब देती है तो छ्प्पर फाड़ कर देती है, शायद इस मौके पर उन्हें इसकी दूसरी लाइन कहनी ठीक नहीं लगी होगी कि जब वापस लेती है तो चमड़ी तक उधेड़ लेती है. जनता जनार्दन के हाथ इस तरह की ताकत आते देख लगता है, अच्छे दिन आ गए हैं.


भले ही अधिसंख्य युवा मतदाता राजनीतिक रूप से अपरिपक्व हो, उसकी राजनैतिक सामाजिक समझ निराशाजनक हो पर यह एक शुरुआत है, इस जनादेश ने उसे अपनी ताकत का अहसास करा दिया है, आगे चल कर वह न सिर्फ परिपक्व होगा बल्कि जान जाएगा कि जिंदा कौमें पांच साल इंतज़ार नहीं करतीं. भले यह बात वह दस साल बाद समझे देश का भविष्य युवा हैं, वे ही सरकार से विकास , नौकरिया और दूसरे जवाब मांगेंगे, उतने ही आक्रामक अंदाज में जितने व्यापक रूप से उन्हें सपने दिखाए गए हैं. तो अब जवाबदेह राजनीति का आगाज होगा. युवा मतदाताओं और घोर प्रचार के चलते मतदान का बढता प्रतिशत इस बात का संकेत तो देता है स्वस्थ लोकतंत्र के अच्छे दिन आने वाले हैं.

जब इसी जनता ने यूपीए को दूसरी बार जिताया था तब भी वह उम्मीद से ही थी और आज भी है, और भले ही मोदी बेहतर करें या बदतर वह उससे बड़ी आशाओं के साथ उनके या किसी और के साथ कल भी उम्मीद से ही रहेगी. उम्मीद यहां का स्थाई भाव है क्योंकि आवश्यकताएं अनंत, अपेक्षाएं अनंत हैं जबकि राजनीतिक दल या नेता उम्मीदों पर आंशिक तौर पर भी खरे नहीं उतरते, हां नए सपने जरूर दिखाते रहते हैं सो आशाएं बनी रहती हैं, उम्मीदें मरती नहीं, एक के बाद एक अपेक्षाएं, खुशफहमी और इसके चलते स्वाभाविक सकारात्मकता बनी ही रहती है. अबकी बार मोदी सरकार” की टेर को जनता ने खूब सुना है.मोदी की मेहनत को तरजीह देते हुए बहुत समझबूझ कर मोदी को खंडित नहीं पूर्ण बहुमत दिया है. इस उम्मीद के साथ कि पूर्ण बहुमत और एक पार्टी की सरकार उनकी आशाओं को खंडित नहीं करेगी. अब गेंद मोदी के पाले में है. जनता को तो पूरा भरोसा है कि अच्छे दिन आ चले हैं, साबित मोदी को करना है.
इस बार के जनादेश को महज यह मानना कि यह एक पार्टी विशेष से ऊबी जनता ने दूसरी पार्टी को सरकार बनाने का जनादेश दे दिया है इसका बहुत सतही विश्लेषण होगा, इस जनादेश ने देश में उम्मीदों के बीज बोए हैं. अब अगर ये बीज ठीक से नहीं जनमे, पनपे और सुफल न दे सके तो जनता इससे भी जबर्दस्त पाटा चला कर फिर नए किस्म के बीज बोने की कला जान गई है. भाजपा के एक प्रवक्ता ने कहा कि जनता जब देती है तो छ्प्पर फाड़ कर देती है, शायद इस मौके पर उन्हें इसकी दूसरी लाइन कहनी ठीक नहीं लगी होगी कि जब वापस लेती है तो चमड़ी तक उधेड़ लेती है. जनता जनार्दन के हाथ इस तरह की ताकत आते देख लगता है, अच्छे दिन आ गए हैं.