महंगाई महाठगिनि हम जानी!

मोंटेक सिंह अहलूवालिया योजना आयोग के उपाध्यक्ष हैं, झूठ थोडे ही बोलेंगे, बड़े भारी अर्थशास्त्री हैं, निरर्थक तो भाखेंगे नहीं. वे कह रहे हैं तो सही ही कह रहे होंगे. उनका कहना है कि, ''मंहगाई नहीं, बल्कि लोगों की संपन्नता बढ रही है''. बड़े लोगों की बड़ी बातें छोटे लोगों के छोटे दिमाग में कैसे समातीं, कई मूढ़मति इसके गूढ़ार्थ को समझ नहीं पाए.
सीधी और सही बात है, समय के साथ साथ अपने उचित मूल्य पर बिक रही वस्तुओं को न खरीद पाने की खुद की अक्षमता को आप मंहगाई का नाम देते हैं फिर अपनी नाकामी का ठीकरा इसी स्वरचित मंहगाई के सिर पर फोड़ते हैं.

हर वक्त यह स्यापा कि पिछले दिनों इसी सीजन में फलां चीज 8 रूपए किलो थी आज 32 रूपए बिक रही है. महंगाई कितनी बढ़ गई है. यह बढ़्त कब और कैसे रुकेगी? कितने शर्मनाक और विकास विरोधी विचार हैं आपके, कितनी नकारात्मक आकांक्षाएं, अपेक्षाएं हैं आपकी, तिस पर आप चाहते हैं कि हम भी आपकी हां में हां मिलाएं? क्यों भई, क्यों? देश, समाज, कला, संस्कृति, फैशन, भ्रष्टाचार, अपराध सब तरक्की करें जबकि वस्तुएं तथा उनके दाम पीछे रह जाएं, स्थिर ही न रहें बल्कि और गिर जाएं. सकल घरेलू उत्पाद बढे, मगर उत्पाद के दाम कतई न बढ़े. क्यों न बढ़ें आखिर क्या पाप किया है उन्होंने? गजब की गिरी हुई सोच है आपकी.

लोग प्लॉट खरीद रहे हैं, आप प्याज तक नहीं खरीद पा रहे तो इसमें सरकार या किसी दूसरे का क्या दोष? आपकी कमाई और क्रयशक्ति नहीं बढ़ी, कम रही तो इसमें इनकी क्या गलती? अपनी बढोतरी न होने की फ्रस्टेशन, कुंठा में आप हर एक की तरक्की से चिढेंगे, चाहे वह नाचीज प्याज ही क्यों न हो. परसों राजा को गाली दे रहे थे, कल येदुरप्पा को कोस रहे थे, आज मंहगाई को. यह कहां का इंसाफ है, यह कहां तक जायज है. असल बात तो यह है कि आपके विचार ही प्रतिगामी हैं, आप प्रगति के विरोधी, उसकेप्रति स्वाभाविक तौर पर इर्ष्यालु हैं.
बड़े साहब को देखिए, कभी मंहगाई को कोसते हुए दिखते हैं, नहीं न. वे पिछले तीन साल में पद और पैसे के मामले में पांच पायदान ऊपर चढे हैं, आप से लोगों ने कहा कि काम ही करते रहोगे तो आगे कब बढोगे? पर आप तो काम ही करते रहे, कुछ और किया ही नहीं, अब अपनी अकर्मणयता को स्वीकारने की बजाए सारा दोष मंहगाई पर मढ़ रहे हैं. सही है, हारे का हरिनाम है मंहगाई, सोचिए जरा, हारी भाजपा मंहगाई पर कितना हल्ला बोल रही है, कामयाब कांग्रेस क्या कभी इस पर कोई कान दे रही है?

मोंटेक कुछ भी गलत नहीं कह रहे. यह आपकी अविकसित समझ का फेर है, आप महंगाई का मतलब भी जानते हैं? मुझे तो नहीं लगता जानते होंगे. मायावी मंहगाई की माया को समझना इतना आसान नहीं. अगर आप आर्थिक तकनीकि शब्दावलि के मुद्रास्फीति शब्द का मतलब मंहगाई मानते हैं, तो आप गलती पर हैं. इससे मंहगाई का मतलब तो है लेकिन यह इसका सटीक अनुवाद नहीं. मतलब मुद्रास्फीति माने म्हंगाई कतई नहीं. मंहगाई स्फीति से कुछ अलग है. वैसे भी इस स्फीति या सूजन में आपको दर्द का भी अनुभव होता है और यह बेदर्द भी होती है. दूसरी किसी सूजन की तरह थोड़े ही दिनों में तो नहीं उतरती पर हां, चली तो जाती ही है फिर आने के लिए. महंगाई एक सापेक्ष शब्द है. मोबाइल के सापेक्ष मटर मंहगी हो रही है तो प्याज के बरअक्स आपको वही मटर कम मंहगी होती लगेगी यहां तक की मोटर भी. प्याज के दाम 150 फीसद बढे हैं, मोटर के तो 15 फीसद भी नहीं.
महंगाई एक मायावी शब्द है जिसके मायने हर आदमी के लिए अलग अलग हैं. मंहगाई का मतलब झाऊ लाल चपरासी की बीवी के लिए अलग हैं तो बडे बाबू के लिए अलग, साहब के लिए भिन्न तो बडे साहब के लिए एकदम अलग. किसी किसी के लिए तो यह शब्द नहीं समूचा जीवन और जीवन शैली है तो किसी किसी के लिए ऐसा कोई शब्द ही नहीं तो उसके मायने वे क्या जानें.किसी किसी के लिए यह शब्द सुना हुआ तो है पर न उसके मायने पता हैं न उसका अहसास, मंत्री महोदय या मोंटेक सिंह के लिए मंहगाई के मायने निस्संदेह आम से अलग होंगे. जाकी रही भावना जैसी, मंहगाई मूरत देखी तिन तैसी.

तो, मंहगाई सापेक्ष, तुलनात्मक, बहुअर्थी, शब्द तो है ही यह भ्रामक और आभासी भी है. अब इस शब्द का जो आभास आपको है, वह शरद पवार को नहीं हो सकता, जो शरद पवार को है वह आडवाणी को नहीं और जो बडे बाबू को है वह रिक्शाचालक राधेलाल को नहीं. कबीर बाबू होते तो इस मायावी शब्द मंहगाई रूपी माया के माहात्म्य में कुछ यूं लिखते .....

मंहगाई महाठगिनि हम जानी.
नेता के घर सोना हुई बैठीं,
जनता के घर कौड़ी कानी!
जमाखोर के घर समरिधि हुई बैठीं,
बाबू के घर बेईमानी!
मंहगाई महाठगिनि हम जानी
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भाजपा के घर मुद्दा हुईं बैठी,
यूपीए के घर परेशानी!
महंगाई महाठगिनि हम जानी.